
जनपद के इतिहास में पहली बार जेम्बो परीक्षा केंद्रों का चयन, भारी वसूली और व्यवस्था की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े
सूत्रों का बड़ा दावा: जिला समिति के चयनित 56 परीक्षा केंद्रों से पचास लाख से अधिक की अवैध वसूली, व्यवस्था कटघरे में
कुशीनगर।
उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद (यूपी बोर्ड) द्वारा संचालित हाईस्कूल व इंटरमीडिएट बोर्ड परीक्षा को लेकर कुशीनगर जनपद में इस बार परीक्षा केंद्रों के चयन ने शिक्षा व्यवस्था की साख पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। नियम, मानक और गाइडलाइन की खुलेआम धज्जियाँ उड़ने से जहां भ्रष्टाचार की तेज़ “बु” आ रही है, वहीं जिले भर में यह मामला चर्चा-ए-सरेआम बना हुआ है।

सूत्रों और जानकारों के मुताबिक, मानकविहीन व वित्तविहीन विद्यालयों को मोटी रकम लेकर परीक्षा केंद्र बनाया गया है, जिससे नकलविहीन, पारदर्शी और निष्पक्ष परीक्षा कराने के यूपी बोर्ड के दावे खोखले नजर आने लगे हैं। हालात इतने संगीन हैं कि जनपद के इतिहास में पहली बार रिकॉर्ड 194 परीक्षा केंद्र बना दिए गए, जबकि छात्र संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है।
छात्र घटे, केंद्र बढ़े – बड़ा सवाल
जानकार बताते हैं कि वर्ष 2024-25 में कुशीनगर में 152 परीक्षा केंद्र बनाए गए थे। वहीं वर्ष 2025-26 की बोर्ड परीक्षा में करीब सात हजार छात्र कम हैं। ऐसे में नियमानुसार परीक्षा केंद्रों की संख्या घटनी चाहिए थी। गणित साफ है—पिछले वर्ष की तुलना में इस बार लगभग 138 केंद्र पर्याप्त होते। लेकिन इसके उलट, जिले में 194 जेम्बो परीक्षा केंद्र बना दिए गए।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि छात्र घटने के बावजूद 42 अतिरिक्त केंद्र क्यों और किस मंशा से बनाए गए? इस पूरे प्रकरण में डीआईओएस श्रवण कुमार गुप्त की भूमिका कटघरे में है, जिस पर अब उंगलियां उठनी स्वाभाविक हैं।
बोर्ड के आदेशों को ताक पर रखा
सूत्रों के अनुसार, यूपी बोर्ड ने वर्ष 2025-26 के लिए 143 परीक्षा केंद्र ही स्वीकृत किए थे। बोर्ड द्वारा सूची जारी कर आपत्ति की अंतिम तिथि 4 दिसंबर तय की गई थी। नियमानुसार, आपत्तियों के निस्तारण के बाद जनपदीय केंद्र निर्धारण समिति के अनुमोदन से डीआईओएस को महज 5 से 10 (अधिकतम 20) केंद्र घटाने-बढ़ाने का अधिकार है।
लेकिन कुशीनगर में यह नियम किताबों तक ही सीमित रह गया। आरोप है कि डीआईओएस ने नियमों को रौंदते हुए 56 अतिरिक्त परीक्षा केंद्र आवंटित कर दिए, जो न सिर्फ नियमविरुद्ध है बल्कि अपने आप में एक नया रिकॉर्ड भी है।
220–280 छात्रों पर बने केंद्र, मानकों की उड़ान
सूत्रों की मानें तो इस बार 220 से 280 छात्रों की संख्या पर भी परीक्षा केंद्र बना दिए गए, जो बोर्ड के निर्धारित मानकों का खुला उल्लंघन है। प्राथमिकता क्रम—राजकीय, सहायता प्राप्त (एडेड) और अंत में वित्तविहीन विद्यालय—को पूरी तरह नजरअंदाज कर वित्तविहीन स्कूलों को खास तरजीह दी गई।
बताया जा रहा है कि इसके पीछे भारी लेन-देन हुआ है। यही वजह है कि कई ऐसे विद्यालय भी परीक्षा केंद्र बना दिए गए, जिनमें सीसीटीवी, बाउंड्रीवाल, पर्याप्त शौचालय, पेयजल, बिजली, सुरक्षा व्यवस्था, स्ट्रांग रूम और डबल लॉक अलमारी जैसी मूलभूत सुविधाएं तक संदिग्ध हैं।
नकल माफिया को खुला मैदान?
शिक्षा जगत के जानकारों का कहना है कि यह पूरा तंत्र नकल माफियाओं को खुला मैदान देने की साजिश जैसा प्रतीत होता है। अधिक केंद्र, कमजोर निगरानी और मानकविहीन व्यवस्थाएं—सब मिलकर परीक्षा के दौरान नकल और अवैध वसूली का चक्रव्यूह तैयार कर सकती हैं।
जांच हुई तो खुलेंगी परतें
विश्वस्त सूत्रों का दावा है कि यदि डीआईओएस द्वारा बनाए गए 56 अतिरिक्त परीक्षा केंद्रों की निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो न सिर्फ शासन की गाइडलाइन के उल्लंघन की लंबी फेहरिस्त सामने आएगी, बल्कि नेक नीयत के दावों की भी पोल खुल जाएगी।
अब सवाल यह है कि जिला प्रशासन और शासन इस गंभीर प्रकरण पर कब संज्ञान लेगा, या फिर शिक्षा व्यवस्था को दांव पर लगाकर यह खेल यूं ही चलता रहेगा?
