
मृतक आश्रित कोटे में नियमों की धज्जियाँ, संवेदनाएँ तार-तार—कागज़ पर प्रक्रिया, जमीन पर पैसों और पहुँच का खेल बेनकाब।
मृतक आश्रित योजना की आड़ में परिवारवाद की चांदी, एक ही घर में दो-दो सरकारी कुर्सियाँ—नियम पस्त, सेटिंग मस्त।
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर न्यूज़ नेटवर्क उत्तर प्रदेश
कुशीनगर। मृतक आश्रित कोटे की आड़ में नियमों की तौहीन, व्यवस्था की बरबादी और नैतिकता की मौत का ऐसा मामला सामने आया है जिसने पूरे तंत्र की पोल खोल दी है। आरोप है कि कुशीनगर जनपद के कसया विकास खंड अंतर्गत सखवनिया स्थित महात्मा गांधी इंटरमीडिएट कॉलेज में अविनाश गुप्ता नामक व्यक्ति ने मां के सरकारी सेवा में कार्यरत होने के बावजूद पिता की मृत्यु का लाभ उठाकर तथ्य छिपाकर मृतक आश्रित कोटे से नौकरी हथिया ली। जहाँ इस योजना का उद्देश्य वास्तविक विपत्ति के शिकार परिवारों को सहारा देना है, वहीं यहाँ पूरी प्रणाली को अंगूठा दिखाते हुए एक सुरक्षित परिवार ने खुद को जरूरतमंद घोषित कर दिया।
विशेषज्ञों का कहना है—“जब घर में पहले से वेतन का स्थायी स्रोत मौजूद था, तब मृतक आश्रित की सुविधा छीनना न सिर्फ नियमों की हत्या है, बल्कि व्यवस्था के मुँह पर ऐसा तमाचा है जिसकी गूँज लंबे समय तक सुनाई देगी।” सवाल यह भी उठता है कि कौन-से अधिकारी, किस शासनादेश के तहत इस नियुक्ति को हरी झंडी दे गए? क्या फाइलों में आंखें बंद थीं, या फिर जेबें खुली थीं? जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय की धृतराष्ट्र जैसी चुप्पी इस पूरे खेल को और संदिग्ध बनाती है।
योजना का मक़सद था बेबस विधवाओं, अनाथ बच्चों और जीवनयापन से वंचित परिवारों को सहारा देना, लेकिन वास्तविक हकदार दफ्तरों के चक्कर काटते रह जाते हैं, और इधर रसूख, पहुंच और कागज़ी चालाकी से सरकारी कुर्सियाँ निजी जागीर बन रही हैं। यह सिर्फ नौकरी पर कब्ज़ा नहीं—जरूरतमंदों के पेट पर लात, न्याय पर प्रहार और सिस्टम की रीढ़ में जंग का ज्वलंत उदाहरण है।
अब बड़ा सवाल यही है—क्या प्रशासन आंखें खोलकर इस भ्रष्ट अध्याय को पलटेगा, या फिर यह खेल यूँ ही चलता रहेगा और व्यवस्था का भरोसा दफनाता रहेगा?

मृतक आश्रित योजना की आड़ में नियमों के चीरहरण और कागज़ी खेल का एक और चौंकाने वाला चेहरा सामने आया है। आरोप है कि सखवनिया स्थित महात्मा गांधी इंटरमीडिएट कॉलेज में कार्यरत अविनाश गुप्ता ने मां के सरकारी सेवा में होने के बावजूद, पिता की मृत्यु का सहारा लेकर मृतक आश्रित कोटे में नौकरी झटक ली—वो भी तथ्य छुपाकर और दस्तावेज़ों के साथ खेल करके।
जानकारी के अनुसार, अविनाश के पिता वर्ष 2004 में खड्डा तहसील क्षेत्र के गांधी इंटरमीडिएट कॉलेज में शिक्षक के पद पर कार्यरत रहते हुए निधन हो गया था, जबकि उसी समय अविनाश की मां स्वास्थ्य विभाग में नियमित सरकारी कर्मचारी थीं। शासनादेश साफ कहता है—यदि परिवार में कोई सदस्य पहले से सरकारी नौकरी में है, तो मृतक आश्रित का लाभ पूर्णतः प्रतिबंधित है। लेकिन नियम ध्वस्त हुए, सच्चाई दबाई गई और वर्ष 2006 में अविनाश ने कसया क्षेत्र के महात्मा गांधी इंटरमीडिएट कॉलेज में परिचारक के पद पर नियुक्ति पा ली। चौंकाने वाली बात यह कि समय बीतते-बीतते अवैध शुरुआत पर इमारत खड़ी करते हुए अब वह सहायक लिपिक की कुर्सी पर विराजमान है।
विशेषज्ञों का सख्त रुख
“यदि यह मामला सही है, तो कार्रवाई सिर्फ कागज़ी नहीं—दमदार होनी चाहिए,” विशेषज्ञों का सुर एक है—अवैध नियुक्ति रद्द, फर्जी दस्तावेज़ों पर एफआईआर, और जिन अफसरों ने फाइल आगे बढ़ाई उन पर निलंबन के साथ विभागीय कार्रवाई। जानकार दो टूक कहते हैं—“अगर ऐसे प्रकरणों पर भी सरकार चुप है, तो संदेश साफ—नियम किताबों में हैं, कुर्सियाँ सेटिंग से मिलती हैं।”
प्रधानाचार्य का जवाब
महात्मा गांधी इंटर कॉलेज सखवनिया के प्रधानाचार्य अमर बहादुर का कहना—“नियुक्ति मेरे कार्यकाल की नहीं, मामला विभागीय जांच का विषय है।”
अब निगाहें प्रशासन पर—क्या यह नियुक्ति कानून की कसौटी पर बचेगी, या फिर सिस्टम में जड़े जमाए रसूख का भार न्याय पर फिर भारी पड़ेगा?
