
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर (संपादकीय लेख)
बुद्धनगरी कुशीनगर की सरजमीं पर देह व्यापार के कथित गोरखधंधे में फंसे मनोकामना होटल पर कसया पुलिस की हालिया कार्रवाई अब जनता की नज़रों में एक रहस्यमयी छापेमारी बनकर तैर रही है। होटल में कथित अनैतिक गतिविधियों की शिकायतें उठीं—छापा पड़ा—युवक-युवतियां हिरासत में आए—लेकिन इसके बाद जो होना चाहिए था, वह हुआ ही नहीं, या यूं कहें कि दिखा ही नहीं।

और बस, यहीं से उठता है सबसे बड़ा सवाल—
“अगर गिरफ्तारी दिखी, तो सीलिंग क्यों नहीं? अगर गड़बड़ी पकड़ में आई, तो मुकदमा कहां गायब?”
कार्रवाई का यह “रुका हुआ फ्रेम” कसया पुलिस की मंशा पर सीधे-सीधे संकेत करता है, चाहे वे संकेत आरोप हों या शंका—जनता की अदालत में तो सवाल खड़े हैं!
क्या यह लापरवाही है, औपचारिकता का नाटक, या अदृश्य दबाव का बोझ, जिसके तले कसया पुलिस की कलम थम गई?
स्क्रीन पर छापा—फाइल पर खामोशी, यही तो कहानी को उबलते तापमान तक ले आती है।

फ्लैशबैक—2023 की सीलिंग, 2025 की ‘चुप्पी’
22 सितंबर 2023—तत्कालीन अधिकारियों की मौजूदगी में मनोकामना होटल सील हुआ था। लाइसेंस न होने और संदिग्ध गतिविधियों के आधार पर कार्रवाई हुई, ताला लगा, होटल बंद—सब कुछ दर्ज रिकॉर्ड पर मौजूद।
लेकिन अब जनता पूछती है—
“जो होटल अवैध पाया गया था, वह दोबारा ‘किसके इशारे पर’ खुल गया?”
क्या प्रशासनिक गलियारे में कोई ऐसी खिड़की है जहाँ से ताले खुल जाते हैं और मामले ठंडे पड़ जाते हैं?
या फिर यह सिर्फ कानून की मजबूरी है… या कानून बनाने वालों की मजबूती?
कसया पुलिस—नियत पर सवाल या व्यवस्था पर अविश्वास?
इस घटनाक्रम के बाद कसया पुलिस पर जनता के मन में संदेह की परतें जमती दिखती हैं।
यदि शिकायतें पुरानी थीं, कार्रवाई दिखी, पर परिणाम गायब, तो सवाल यह भी उठना अवश्यंभावी है—
“क्या कसया में होटल चल रहे हैं या होटल चलाने वालों की रसूख की छत्रछाया?”
“कानून लागू है या कानून लागू करने वालों पर किसी का प्रभाव भारी?”
यहां संपादकीय दृष्टिकोण स्पष्ट है—
यदि कार्रवाई अधूरी रह जाती है, तो जनता धारणा बनाती है
और धारणा—कभी-कभी निर्णय से ज्यादा कड़वी होती है।
अंत में… जनता की फाइल अभी बंद नहीं हुई
जब तक इस मामले का खुला निष्कर्ष सामने नहीं आता, तब तक सवाल यूं ही दस्तक देते रहेंगे—
होटल में पकड़ कौन गया था—लोग या कानून?
सील किसे होना चाहिए था—दरवाजे या नीयत?
और सबसे बड़ा सवाल—
“क्या छापेमारी सिर्फ कैमरे के लिए थी… या कानून के लिए?”
सत्ता चाहे जो भी कहे—
जनता का संपादकीय फैसला साफ है—
मामला बंद नहीं… मामला गर्म है!

