
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर | तमकुही राज
कुशीनगर जनपद की तमकुही राज तहसील में पारदर्शिता और सुशासन की दिशा में एक अहम कदम उठाया गया है। तहसील परिसर के सभी पटलों और कार्यालयों को अब सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में लाया जा रहा है। यह पहल उपजिलाधिकारी (एसडीएम) आकांक्षा मिश्रा द्वारा अमल में लाई गई है। प्रशासन इसे सुधार की कवायद बता रहा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह व्यवस्था सच में सुशासन की सोच से प्रेरित है या फिर वर्षों से लंबित आमजन की शिकायतों की मौन स्वीकारोक्ति?
तहसील जैसे संवेदनशील कार्यालय में फरियादियों का आना-जाना रोज़ का सच है। जमीन, दाखिल-खारिज, जाति-निवास प्रमाण पत्र, राजस्व विवाद—हर काम में आम आदमी को चक्कर काटने पड़ते हैं। बार-बार शिकायतें आती रहीं कि कुछ पटलों पर काम समय पर नहीं होता, फरियादियों से दुर्व्यवहार होता है और कई मामलों में “अनौपचारिक अपेक्षाएं” भी रखी जाती हैं। इन्हीं शिकायतों के दबाव में अब कैमरों की आंखें खुली हैं।
सीसीटीवी निगरानी का उद्देश्य साफ बताया जा रहा है—कार्यालयी कामकाज में पारदर्शिता, कर्मचारियों की जवाबदेही और फरियादियों के साथ शालीन व्यवहार। लेकिन प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि यदि सब कुछ पहले से ठीक था, तो शिकायतों का अंबार क्यों लगा? क्या कैमरे लगने से पहले जिम्मेदारी तय नहीं की जानी चाहिए थी? क्या वर्षों से चली आ रही अव्यवस्थाओं की जवाबदेही किसी अफसर या कर्मचारी पर तय होगी?
यह भी गौर करने वाली बात है कि सीसीटीवी लगाना केवल निगरानी का साधन है, समाधान नहीं। असली परीक्षा तब होगी जब कैमरे में कैद लापरवाही, टालमटोल या दुर्व्यवहार पर वास्तविक कार्रवाई होगी। यदि फुटेज सिर्फ सर्वर में बंद रह गया और दोषियों पर कोई ठोस कदम नहीं उठा, तो यह पहल भी कागजी सुशासन बनकर रह जाएगी।
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर का स्पष्ट मानना है कि पारदर्शिता का मतलब केवल कैमरे लगाना नहीं, बल्कि दोषी व्यवस्था और जिम्मेदार अफसरों को कटघरे में खड़ा करना भी है। अब निगरानी शुरू हो चुकी है, देखना यह है कि प्रशासन खुद को भी उसी कसौटी पर कसने का साहस दिखाता है या नहीं। जनता की नजर अब सिर्फ कैमरों पर नहीं, बल्कि उन अफसरों पर भी है जिनके कंधों पर सुशासन की असली जिम्मेदारी है।

