
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर | विशेष रिपोर्ट
ग्रामीण भारत की रीढ़ माने जाने वाले मनरेगा को अब “VB-G RAM G” के नए अवतार में पेश किया जा रहा है। कागज़ों पर यह योजना गांवों को आत्मनिर्भर बनाने, मजदूरों की आय सुरक्षा बढ़ाने और पारदर्शिता लाने का दावा करती है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर नजर आती है। सरकार ने काम के दिनों की गारंटी 100 से बढ़ाकर 125 दिन कर दी, भुगतान की समय-सीमा 15 दिनों से घटाकर साप्ताहिक कर दी और बेरोजगारी भत्ता व अतिरिक्त सहायता के प्रावधान जोड़ दिए। सवाल यह है कि क्या कुशीनगर जैसे जिलों में यह बदलाव वास्तव में मजदूरों तक पहुंचेगा या फिर फाइलों में ही दम तोड़ देगा?
योजना के तहत कहा गया है कि अब मजदूरी समय पर मिलेगी, जिससे श्रमिकों की आजीविका मजबूत होगी। लेकिन सच्चाई यह है कि आज भी हजारों मजदूर महीनों तक भुगतान के लिए भटकते हैं। ग्राम पंचायतों में कार्य स्वीकृति, मस्टर रोल और ऑनलाइन एंट्री की धीमी रफ्तार मजदूरों के धैर्य की परीक्षा ले रही है। साप्ताहिक भुगतान का सपना तब तक खोखला है, जब तक जिला और ब्लॉक स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होती।
VB-G RAM G का एक बड़ा दावा पारदर्शिता और जवाबदेही का है। योजना कहती है कि निगरानी मजबूत होगी और भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी। परंतु कुशीनगर में तालाब खुदाई, चेकडैम, भूमि समतलीकरण और वृक्षारोपण जैसे कार्यों में पहले से ही अनियमितताओं की शिकायतें आम हैं। कई जगह अधूरे काम, फर्जी हाजिरी और मशीनों से कार्य कराने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में नई योजना पुराने ढर्रे पर ही चले, तो यह केवल नाम बदलने की कवायद बनकर रह जाएगी।
योजना के अंतर्गत जल संरक्षण, ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर, आजीविका संवर्धन और आपदा प्रबंधन जैसे चार मुख्य क्षेत्रों पर काम करने की बात है। डेयरी, पोल्ट्री, मत्स्य पालन, SHG आधारित सूक्ष्म उद्योग और कौशल प्रशिक्षण से रोजगार सृजन का वादा किया गया है। लेकिन प्रशासनिक उदासीनता और निगरानी के अभाव में ये योजनाएं अक्सर कागज़ी साबित होती हैं। गांवों में आज भी बेरोजगार युवा शहरों की ओर पलायन को मजबूर हैं।
प्रशासनिक व्यय 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 9 प्रतिशत किया गया है, ताकि कर्मचारियों को समय पर वेतन मिल सके और कार्य सुचारु चले। परंतु यदि यह अतिरिक्त बजट भी केवल कार्यालयों की चारदीवारी में सिमट गया, तो मजदूरों को क्या मिलेगा? 60 दिनों की नो-वर्क अवधि का प्रावधान किसानों और श्रमिकों दोनों के लिए राहत बताया जा रहा है, लेकिन इसके क्रियान्वयन पर कोई ठोस तंत्र नहीं दिखता।
स्पष्ट है कि VB-G RAM G तभी सफल होगी, जब जिला प्रशासन कागज़ी आदेशों से बाहर निकलकर सख्त निगरानी करे। वरना यह योजना भी अन्य योजनाओं की तरह फाइलों में चमकेगी और गांवों में अंधेरा ही बना रहेगा। कुशीनगर के मजदूरों को अब घोषणाएं नहीं, जमीन पर काम और समय पर मजदूरी चाहिए। प्रशासन को यह समझना होगा कि विकास भाषणों से नहीं, ईमानदार क्रियान्वयन से होता है।

