
नियमों की हत्या कर मृतक कोटे में नौकरी हथियाने के खुलासे के बाद भी डीआईओएस का संदिग्ध मौन, प्रशासनिक संरक्षण
नियम तोड़े, कोर्ट के आदेश कुचले, फिर भी जिम्मेदारों पर कोई कार्रवाई नहीं, प्रशासन की निष्क्रियता ने उठाए गंभीर सवाल
कुशीनगर। सरकारी नियमों को पैरों तले रौंदकर, व्यवस्था की आंखों में धूल झोंकते हुए फर्जी तरीके से नौकरी हथियाने का सनसनीखेज मामला सामने आने के बावजूद जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) की चुप्पी अब कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। महात्मा गांधी इंटर कॉलेज, सखवनिया में सहायक लिपिक पद पर तैनात अविनाश गुप्ता की नियुक्ति को लेकर हुए खुलासे ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिया है।
बताया जा रहा है कि अविनाश गुप्ता ने अपने पिता की मृत्यु के बाद मृतक आश्रित कोटे के तहत नौकरी हासिल की, जबकि वास्तविकता यह है कि उसकी माता पहले से ही स्वास्थ्य विभाग में नियमित सरकारी सेवा में कार्यरत थीं। नियमों के अनुसार, यदि परिवार का कोई भी सदस्य सरकारी नौकरी में है तो मृतक आश्रित कोटे में नियुक्ति पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसके बावजूद महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाकर और दस्तावेजों में कथित हेराफेरी कर अवैध नियुक्ति हासिल कर ली गई।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मामला उजागर होने, मीडिया में सुर्खियां बनने और नियमों की स्पष्ट अवहेलना सामने आने के बाद भी डीआईओएस कार्यालय द्वारा न तो कोई विभागीय जांच बैठाई गई और न ही अब तक नियुक्ति निरस्त की गई। यह चुप्पी अब महज लापरवाही नहीं, बल्कि फर्जीवाड़े को संरक्षण देने जैसी प्रतीत हो रही है।
यह प्रकरण न केवल विभागीय नियमों की अनदेखी है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देशों की भी खुली अवहेलना है। ऐसे में शिक्षा विभाग की निष्क्रियता उसकी वैधानिक और नैतिक साख पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रही है।
⚖️ साहब! न्यायालय का आदेश नजीर है नजारा
मृतक आश्रित नियुक्ति को लेकर सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के स्पष्ट व सख्त निर्देशों के बावजूद कुशीनगर में नियमों की धज्जियां उड़ती नजर आ रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1994 में उमेश कुमार नागपाल बनाम हरियाणा सरकार मामले में साफ कहा था कि मृतक आश्रित नियुक्ति कोई अधिकार नहीं, बल्कि केवल तत्काल आर्थिक संकट से उबरने के लिए दी जाने वाली असाधारण राहत है। यदि परिवार का कोई सदस्य पहले से रोजगार में है, तो अनुकंपा नियुक्ति नहीं दी जा सकती।

इसी तरह वर्ष 2019 में राज्य सरकार हिमाचल प्रदेश बनाम शशि कुमार मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने दो टूक कहा कि करुणा नियुक्ति का उद्देश्य सरकारी नौकरी बांटना नहीं, बल्कि मृतक कर्मचारी के परिवार को भुखमरी से बचाना है। पात्रता के नियमों से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट प्रयागराज भी कई मामलों में स्पष्ट कर चुका है कि यदि परिवार का कोई सदस्य सरकारी या स्थायी रोजगार में है, तो मृतक आश्रित के तहत दी गई नियुक्ति शून्य मानी जाएगी और उसे तत्काल प्रभाव से निरस्त कर वेतन की वसूली की जा सकती है। एक प्रकरण में हाईकोर्ट ने यहां तक कहा कि माँ के सरकारी सेवा में रहते हुए तथ्य छिपाकर नियुक्ति पाना पूरी तरह अवैध है।
इन स्पष्ट न्यायिक आदेशों के बावजूद कुशीनगर में सहायक लिपिक अविनाश गुप्ता की नियुक्ति पर अब तक कोई कार्रवाई न होना न केवल प्रशासनिक उदासीनता, बल्कि न्यायालय के आदेशों की खुली अवहेलना का संकेत देता है। यह चुप्पी अब “मौन संरक्षण” के रूप में देखी जा रही है।
⚠️ विधि विशेषज्ञों की राय
विधि विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि यह नियुक्ति पूरी तरह नियमविरुद्ध और अवैध है। कानूनी जानकारों के अनुसार, मृतक आश्रित योजना का लाभ तभी दिया जा सकता है जब परिवार में कोई भी सदस्य सरकारी नौकरी में न हो। ऐसे में सहायक लिपिक अविनाश गुप्ता की नियुक्ति प्रथम दृष्टया अवैध है और इसे तत्काल निरस्त किया जाना चाहिए।

विशेषज्ञों का कहना है कि अब तक दिए गए वेतन की वसूली के साथ-साथ इस फर्जीवाड़े में शामिल कर्मचारियों और अधिकारियों पर एफआईआर तथा विभागीय कार्रवाई भी अनिवार्य है। कार्रवाई न होना यह दर्शाता है कि कुशीनगर में न केवल विभागीय नियमों, बल्कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेशों की भी खुलेआम अनदेखी की जा रही है।
कानूनी दृष्टि से यह मामला सिर्फ एक कर्मचारी की अवैध नियुक्ति का नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा विभाग की कार्यशैली और नैतिकता पर उठते गंभीर सवालों का प्रतीक बन चुका है।
📝 क्या है मामला
मामला सखवनिया स्थित महात्मा गांधी इंटरमीडिएट कॉलेज से जुड़ा है। कॉलेज में सहायक लिपिक पद पर कार्यरत अविनाश गुप्ता के पिता खड्डा तहसील क्षेत्र के गांधी इंटरमीडिएट कॉलेज में कार्यरत थे। वर्ष 2004 में सेवा के दौरान उनके पिता का निधन हो गया। उस समय अविनाश की माँ स्वास्थ्य विभाग में नियमित सरकारी कर्मचारी के रूप में कार्यरत थीं।
शासनादेश और स्पष्ट सरकारी नियमों के अनुसार, यदि परिवार का कोई सदस्य पहले से सरकारी सेवा में है तो मृतक आश्रित योजना का लाभ नहीं दिया जा सकता। इसके बावजूद आरोप है कि अविनाश गुप्ता ने इस तथ्य को छिपाकर, दस्तावेजों में कथित हेराफेरी कर कसया विकासखंड के सखवनिया स्थित महात्मा गांधी इंटरमीडिएट कॉलेज में सहायक लिपिक की नौकरी हासिल कर ली।
अब सवाल यह है कि इतने स्पष्ट नियमों और खुलासों के बाद भी जिम्मेदार अधिकारी कब कार्रवाई करेंगे?

