
देशभर में यूजीसी (UGC) से जुड़ी मांगों को लेकर शिक्षकों व कर्मचारियों ने आज एक स्वर में हड़ताल व प्रदर्शन कर व्यवस्था को आईना दिखाने की कोशिश की। विश्वविद्यालयों से लेकर महाविद्यालयों तक शैक्षणिक गतिविधियां ठप रहीं और नाराजगी खुलकर सड़कों पर उतरी। नारों में आक्रोश था, बैनरों में सवाल थे और आवाज़ में वर्षों से उपेक्षा का दर्द साफ झलक रहा था।
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के दावे केवल फाइलों तक सीमित रह गए हैं, जबकि जमीनी हकीकत बद से बदतर होती जा रही है। यूजीसी के नियम, वेतनमान, पेंशन और नियुक्तियों से जुड़े मुद्दों पर सरकार की चुप्पी ने शिक्षकों को आंदोलन के लिए मजबूर कर दिया।
इसी बीच अब कुशीनगर जनपद की तहसील तमकुही राज में उप मुख्यमंत्री के प्रस्तावित आगमन ने सियासी और प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज कर दी है। सवाल यह नहीं कि उप मुख्यमंत्री आएंगे या नहीं, असली सवाल यह है कि क्या यह आगमन आंदोलन की आवाज़ को सुनने के लिए होगा या फिर हमेशा की तरह “औपचारिकता निभाकर आगे बढ़ जाने” की परंपरा दोहराई जाएगी।
हड़ताल के बाद अब प्रदर्शनकारियों में यह चर्चा तेज है कि उप मुख्यमंत्री के कार्यक्रम का स्वर्ण बहिष्कार किया जाए या नहीं। कुछ का मानना है कि सत्ता के सामने मौन रहना सबसे बड़ा अपराध होगा, जबकि अन्य का कहना है कि बहिष्कार के जरिए सरकार को यह संदेश देना जरूरी है कि शिक्षा को नजरअंदाज करने की कीमत चुकानी पड़ेगी।
प्रशासनिक तैयारियां पूरे जोर-शोर से चल रही हैं—सफाई, मंच, स्वागत और सुरक्षा व्यवस्था में कोई कमी नहीं छोड़ी जा रही। मगर सवाल यह है कि क्या मंच से शिक्षकों की पीड़ा का जिक्र होगा या फिर तालियों और भाषणों के शोर में असली मुद्दे दबा दिए जाएंगे?
अब निगाहें तमकुही राज पर टिकी हैं। यह आगमन केवल एक दौरा साबित होगा या शिक्षा जगत के लिए किसी निर्णायक संदेश की शुरुआत—इसका जवाब आने वाला समय देगा। फिलहाल, आंदोलन की चिंगारी सुलग चुकी है और अगर इसे नजरअंदाज किया गया, तो यह आग बनकर फैलने से कौन रोक पाएगा?
