
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर | विशेष संवाददाता
कुशीनगर। जनपद की पडरौना तहसील इन दिनों ऐसे गंभीर प्रशासनिक विवाद के केंद्र में है, जिसने शासन-प्रशासन की कार्यशैली, जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। हाईकोर्ट की स्पष्ट रोक के बावजूद खरवार जाति का अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र जारी होना महज़ लापरवाही नहीं, बल्कि नियम-कानून, संविधान और सामाजिक न्याय की खुलेआम अवहेलना मानी जा रही है। यह मामला पूरे प्रशासनिक तंत्र पर करारा तमाचा साबित हो रहा है।
बताया जा रहा है कि पडरौना तहसील में तैनात लेखपाल अविनाश प्रताप राव ने शासनादेश, न्यायालय के निर्देश और राजस्व अभिलेखों को दरकिनार करते हुए खरवार जाति का एससी प्रमाणपत्र निर्गत कर दिया। हैरानी की बात यह है कि कुशीनगर जिले के राजस्व रिकॉर्ड में धनगर जाति का कोई भी अधिकृत अभिलेख अस्तित्व में नहीं बताया जा रहा है। इसके बावजूद प्रमाणपत्र जारी किया जाना यह संकेत देता है कि यह कोई साधारण भूल नहीं, बल्कि एक सुनियोजित और सोची-समझी कार्रवाई हो सकती है।
हाईकोर्ट के आदेश की खुली अवहेलना
जानकारों के अनुसार हाईकोर्ट पहले ही खरवार जाति को अनुसूचित जाति प्रमाणित करने पर रोक लगा चुका है। इसके बाद भी प्रमाणपत्र जारी होना सीधे-सीधे अदालत के आदेशों की अवहेलना है। सवाल यह उठता है कि क्या संबंधित लेखपाल ने न्यायालय के आदेशों को पढ़ने तक की जहमत नहीं उठाई, या फिर किसी संरक्षण में रहते हुए जानबूझकर अनदेखी की? क्या कोई ऐसा “सिस्टम” है जो इस तरह की मनमानी को शह दे रहा है?
आरक्षण व्यवस्था पर सीधा हमला
विधि विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला किसी एक व्यक्ति को लाभ पहुंचाने का नहीं, बल्कि पूरी आरक्षण व्यवस्था पर सीधा डाका है। फर्जी या अवैध जाति प्रमाणपत्रों के माध्यम से जब कोई लाभ लेता है, तो उसका सीधा नुकसान वास्तविक अनुसूचित जाति के हकदारों को होता है। चौंकाने वाली बात यह है कि मामला सार्वजनिक होने के बावजूद तहसील और जिला प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है। यदि लेखपाल अकेला दोषी है, तो अब तक निलंबन की कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
जनआक्रोश और कार्रवाई की मांग
लेखपाल अविनाश प्रताप राव की इस कथित कारस्तानी को लेकर आम जनमानस में भारी आक्रोश व्याप्त है। लोगों ने जिलाधिकारी से मांग की है कि दोषी लेखपाल को तत्काल निलंबित किया जाए, जारी किए गए अवैध एससी प्रमाणपत्र को रद्द किया जाए और पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय, निष्पक्ष व समयबद्ध जांच कराई जाए।
दोष सिद्ध, फिर भी कार्रवाई शून्य
सूत्रों के मुताबिक तहसीलदार पडरौना की जांच रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि लेखपाल ने अधिकारों का घोर दुरुपयोग करते हुए आपत्तिजनक ढंग से जाति प्रमाणपत्र जारी किया। रिपोर्ट में निलंबन और विभागीय कार्रवाई की संस्तुति भी दर्ज है। इसके बावजूद उपजिलाधिकारी द्वारा अब तक कोई ठोस कदम न उठाया जाना प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न है।
अब निगाहें जिलाधिकारी पर टिकी हैं—क्या वे इस मामले में सख्त कार्रवाई कर न्याय और संविधान की गरिमा बहाल करेंगे, या फिर यह मामला भी फाइलों में दफन होकर रह जाएगा?
