


विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर | विशेष संवाददाता
कुशीनगर। पडरौना का चर्चित राजदरबार स्थित “आनंद भवन” इन दिनों कानूनी घेराबंदी के केंद्र में है। न्यायालय के निर्देश पर कोतवाली पडरौना पुलिस ने राज परिवार की सदस्य शरद कुमारी देवी सहित पन्द्रह लोगों के विरुद्ध धोखाधड़ी, जालसाजी, कूटरचना और आपराधिक साजिश की गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है। हाई-प्रोफाइल नामों के शामिल होने से जिले के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह मामला सिर्फ जमीन विवाद तक सीमित है या फिर राजस्व और रजिस्ट्री तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी गहरे संकेत दे रहा है।
मामला पडरौना कोतवाली क्षेत्र के ग्राम जंगल बेलवा टोला चौरसिया स्थित आराजी संख्या 604, रकबा 1.2830 हेक्टेयर भूमि से जुड़ा है। वादी सुरेन्द्र यादव का दावा है कि उक्त जमीन उनके पूर्वजों की पुश्तैनी संपत्ति है, जिस पर आजादी से पहले से परिवार का कब्जा रहा। पिता के निधन के बाद विधिवत वरासत के जरिए जमीन उनके नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज है। कई फसली वर्षों के इंतखाप और दस्तावेज भी वादी के पास मौजूद बताए जा रहे हैं।
वादी का आरोप है कि शरद कुमारी देवी, पुत्री राजा अनिरुद्ध प्रताप नारायण सिंह, ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर कथित साजिश रची और धोखाधड़ी के माध्यम से जमीन का बैनामा करा लिया। आरोपों के अनुसार गिरिजेश कुमार जायसवाल, सज्जाद अली, मनीष जायसवाल, संजीव जायसवाल, सूर्यप्रकाश शुक्ला, सतीशचन्द्र कुशवाहा समेत अन्य के नाम पर फर्जी तरीके से रजिस्ट्री कराई गई। वादी का कहना है कि बैनामों में कूटरचना कर दस्तावेज तैयार किए गए और गवाहों ने यह जानते हुए हस्ताक्षर किए कि भूमि विवादित है। पुलिस ने शिकायत और न्यायालयीय निर्देश के आधार पर प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
इस कार्रवाई ने प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही पर भी बहस छेड़ दी है। स्थानीय स्तर पर लोग पूछ रहे हैं कि यदि भूमि विवादित थी तो रजिस्ट्री और सत्यापन की प्रक्रिया में रेड फ्लैग क्यों नहीं उठा? क्या कागजी जांच महज औपचारिकता बनकर रह गई? “जीरो टॉलरेंस” के दावों के बीच यह प्रकरण सिस्टम की कसौटी बनता दिख रहा है।
पुलिस सूत्रों के अनुसार, विवेचना में दस्तावेजों की वैधता, गवाहों की भूमिका और राजस्व रिकॉर्ड का मिलान प्रमुख बिंदु होंगे। वहीं, प्रशासन का कहना है कि तथ्यों के आधार पर निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाएगी।
फिलहाल, आनंद भवन से उठी यह कानूनी आहट दूर तक सुनाई दे रही है। सच और साजिश के बीच की रेखा अब जांच की स्याही से तय होगी—और जनता की नजरें नतीजों पर टिकी हैं।
