
सिस्टम की गलती, छात्रों को मिली सजा: हाईकोर्ट से भी नहीं राहत, भविष्य पर अनिश्चितता के गहरे बादल छाए
फर्जीवाड़े पर कोर्ट की चोट: सिस्टम के भेंट चढ़े 700 परीक्षार्थी, करियर संकट में, जवाबदेही पर गरमा गई बहस
कुशीनगर | विलेज फास्ट टाइम्स | विशेष संवाददाता
पडरौना नगर का गोस्वामी तुलसीदास इंटर कॉलेज इन दिनों ऐसी सुर्खियों में है, जिनमें चमक कम और चिंता ज्यादा है। करीब 700 छात्र इस साल परीक्षा कक्ष की दहलीज तक नहीं पहुंच सके—और वजह बताई जा रही है कागज़ी कारगुज़ारियों का ऐसा जाल, जिसमें सपने उलझकर रह गए। शिक्षा की पटरी पर दौड़ते इन विद्यार्थियों के लिए यह झटका किसी आकस्मिक ब्रेक जैसा साबित हुआ, जिसने पूरे शैक्षणिक वर्ष को अधर में टांग दिया।
मामले ने जब कानूनी मोड़ लिया, तो निगाहें इलाहाबाद उच्च न्यायालय पर टिक गईं। लेकिन अदालत ने आवेदन-पत्रों में पाई गई गंभीर अनियमितताओं को आधार मानते हुए ‘नो रिलीफ’ की टिप्पणी के साथ तत्काल राहत से इंकार कर दिया। न्यायालय का संदेश स्पष्ट रहा—परीक्षा प्रक्रिया में नियमों से कोई समझौता नहीं। फैसले की सख्ती ने एक ओर वैधानिकता की मर्यादा रेखांकित की, तो दूसरी ओर सैकड़ों छात्रों के लिए निराशा की लकीर भी गहरी कर दी।

कैसे फंसा 700 छात्रों का भविष्य?
सूत्रों के अनुसार, पत्राचार पंजीकरण और बोर्ड परीक्षा से जुड़ी औपचारिकताओं में कथित रूप से भारी चूक हुई। समय से ऑनलाइन प्रविष्टियां, सत्यापन और आवश्यक अभिलेख अपलोड नहीं किए गए। आरोपों की आंच नोडल अधिकारी विकास मणि त्रिपाठी पर निगरानी में कोताही के रूप में पहुंची, जबकि विद्यालय के प्रधान लिपिक ज्ञान प्रकाश पाठक पर कागजी कार्रवाई में गंभीर त्रुटियों के आरोप लगे।
सबसे गंभीर आरोप—बोर्ड को अग्रसारित आवेदन-पत्रों पर नोडल अधिकारी के अधिकृत हस्ताक्षर नहीं पाए गए। उनकी जगह प्रधान लिपिक द्वारा किए गए हस्ताक्षर जांच में कथित रूप से फर्जी बताए गए। जांच रिपोर्ट के आधार पर बोर्ड ने आवेदन निरस्त कर दिए, और नतीजा यह कि प्रवेश पत्र जारी ही नहीं हो सके। परीक्षा के दिन विद्यार्थियों के पास तैयारी थी, पर हॉल टिकट नहीं।
“बिना फेल हुए बर्बाद हुआ साल”
परीक्षा से वंचित छात्रों के चेहरों पर मायूसी और आक्रोश साफ पढ़ा जा सकता है। किसी का लक्ष्य सेना भर्ती था, कोई पॉलिटेक्निक या स्नातक प्रवेश की राह देख रहा था। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह नुकसान केवल शैक्षणिक नहीं, बल्कि आर्थिक और मानसिक आघात भी बन गया। एक छात्र की पीड़ा छलकी—
“हमने सालभर मेहनत की, गलती अफसरों की थी, सज़ा हमें मिल गई।”
अभिभावकों का सवाल भी उतना ही तीखा—यदि चूक प्रशासनिक स्तर पर हुई, तो छात्रों का साल क्यों कुर्बान? उन्होंने दोषियों पर कठोर कार्रवाई और विद्यार्थियों के लिए विशेष परीक्षा या वैधानिक विकल्प की मांग उठाई है।
न्यायालय का सख्त संदेश
अदालत के रुख ने शिक्षा तंत्र को आईना दिखाया है। न्यायालय ने दो टूक कहा कि पारदर्शिता और वैधानिकता सर्वोपरि हैं। यदि आवेदन-पत्र ही विधिसम्मत नहीं, तो परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी जा सकती। सहानुभूति अपनी जगह, पर प्रक्रियात्मक शुचिता से समझौता नहीं।
जिम्मेदार कौन?
अब बहस का केंद्र यही है—जवाबदेही तय कब और कैसे होगी?
क्या नोडल अधिकारी की जानकारी के बिना दस्तावेज अग्रसारित हुए?
अंतिम सत्यापन की जिम्मेदारी निभाने वाला डीआईओएस कार्यालय समय रहते खामियां क्यों नहीं पकड़ सका?
फर्जी हस्ताक्षर जैसी गंभीर बात पर कार्रवाई की दिशा क्या होगी?
यदि हस्ताक्षर वास्तव में फर्जी पाए गए, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि दंडनीय कृत्य की श्रेणी में आता है। विद्यालय प्रबंधन और शिक्षा विभाग—दोनों की भूमिका अब जांच के घेरे में है।
आगे की राह
फिलहाल छात्रों के सामने अगला शैक्षणिक सत्र ही व्यावहारिक विकल्प दिखता है। हालांकि, शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि शासन स्तर पर गंभीर पहल हो, तो विशेष अनुमति या वैकल्पिक परीक्षा जैसे रास्तों की संभावना तलाशी जा सकती है। लेकिन जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होती और ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह प्रकरण शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर बड़ा प्रश्नचिह्न बना रहेगा।
कागज़ों की गलती ने कैलेंडर से एक साल छीन लिया। नियमों की सख्ती जरूरी है, पर सवाल यह भी कि लापरवाही की कीमत आखिर कब तक छात्र चुकाते रहेंगे?
