




05 अप्रैल | विलेज फास्ट टाइम्स | कुशीनगर
डिजिटल युग के शोर, टीआरपी की दौड़ और खबरों की बाज़ारवादी चमक के बीच आज पडरौना में आयोजित ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन के प्रांतीय सम्मेलन ने पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। मंच से प्रदेश सरकार के कृषि मंत्री सूर्यप्रताप शाही ने जहां अखबारों को “विश्वसनीयता का पैमाना” बताया, वहीं उनके इस बयान ने अप्रत्यक्ष रूप से इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया की गिरती साख पर तीखा कटाक्ष भी कर दिया।
शाही ने साफ कहा कि बदलते दौर में पत्रकारिता का स्वरूप भले बदल गया हो, लेकिन “अखबार आज भी सच के सबसे मजबूत गवाह हैं।” उनका यह बयान उस समय आया है जब फेक न्यूज, आधी-अधूरी सूचनाएं और सनसनीखेज प्रस्तुति पत्रकारिता की साख को लगातार चोट पहुंचा रही हैं। उन्होंने पत्रकारों को नसीहत दी कि खबरों को मसालेदार बनाने के बजाय तथ्यपरक और जिम्मेदार पत्रकारिता को प्राथमिकता दें—हालांकि सवाल यह भी है कि क्या सत्ता स्वयं हमेशा “पूर्ण सत्य” को स्वीकार करने का साहस दिखाती है?
कार्यक्रम में देवरिया सांसद शशांक मणि त्रिपाठी ने भी पत्रकारों की भूमिका को आईना दिखाते हुए कहा कि “अर्धसत्य सबसे बड़ा भ्रम है” और पत्रकारों का दायित्व है कि वे समाज के सामने पूरा सच रखें। उनका यह बयान कहीं न कहीं उन खबरों पर तंज था जो आधी जानकारी के सहारे जनमत को प्रभावित करने का प्रयास करती हैं।
वहीं कुशीनगर सांसद विजय कुमार दुबे ने ग्रामीण पत्रकारिता को “चुनौतीपूर्ण” बताते हुए कहा कि गांवों में काम करने वाले पत्रकार संसाधनों की कमी, दबाव और जोखिम के बीच भी सच्चाई सामने लाने का प्रयास करते हैं। उनका यह कथन ग्रामीण पत्रकारों की जमीनी हकीकत को उजागर करता है, जहां एक खबर लिखना कई बार प्रशासनिक दबाव और सामाजिक टकराव को न्योता देने जैसा होता है।
कार्यक्रम के दौरान कई जनप्रतिनिधियों ने मंच साझा किया और पत्रकारों की सराहना की, लेकिन यह भी कटाक्ष का विषय रहा कि जिन समस्याओं को वर्षों से उठाया जा रहा है, वे अब तक समाधान की राह क्यों नहीं देख पाईं। सम्मेलन में सात सूत्रीय मांग पत्र भी सौंपा गया—अब देखना यह है कि यह पत्र फाइलों में दबता है या वास्तव में किसी कार्रवाई की जमीन तैयार करता है।
सम्मेलन के संयोजक शैलेश कुमार उपाध्याय ने अतिथियों का स्वागत किया और पत्रकारों के सम्मान की बात कही, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि सम्मान समारोहों से ज्यादा पत्रकारों को सुरक्षा, स्वतंत्रता और निष्पक्ष माहौल की जरूरत है।
कार्यक्रम का संचालन अनूप कुमार मिश्र ने किया और बड़ी संख्या में पत्रकारों व गणमान्य लोगों की उपस्थिति रही। लेकिन पूरे आयोजन का सार यही रहा कि मंच से भले ही “सत्य” और “विश्वसनीयता” की बातें गूंजती रहीं, असली परीक्षा तो तब होगी जब यही सिद्धांत जमीन पर उतरेंगे।
सवाल अब भी खड़ा है—क्या पत्रकारिता सच में स्वतंत्र है, या फिर सच आज भी सत्ता और सिस्टम के बीच कहीं दबा हुआ है?
