
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर | विशेष संवाददाता
कुशीनगर जनपद के नेबुआ नौरंगिया थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम मिश्रौली में एक मामूली बैरिकेड विवाद ने ऐसा विकराल रूप ले लिया कि पूरे इलाके में कानून-व्यवस्था की हकीकत खुलकर सामने आ गई। यह घटना न सिर्फ प्रशासनिक तंत्र की सुस्ती को उजागर करती है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा करती है कि आखिर दबंगों के हौसले किसकी सरपरस्ती में इतने बुलंद हो चुके हैं?
सूत्रों के अनुसार, पीड़ित शाबिर खान के घर के सामने हाल ही में बनी इंटरलॉकिंग सड़क को सुरक्षित रखने हेतु ग्राम प्रधान द्वारा लगाया गया बांस का बैरिकेड बीती रात अज्ञात लोगों द्वारा तोड़ दिया गया। सुबह जब इस घटना की जानकारी जुटाई जा रही थी, तभी नामजद आरोपियों ने मौके पर पहुंचकर न सिर्फ अभद्र भाषा का प्रयोग किया बल्कि खुलेआम मारपीट पर उतारू हो गए। स्थिति इतनी भयावह हो गई कि महिलाओं तक को नहीं बख्शा गया—जिससे गांव में भय और आक्रोश का माहौल बन गया।
लेकिन असली सनसनी तब फैली जब कुछ ही घंटों के भीतर लगभग 7 मोटरसाइकिलों पर सवार होकर 20 से अधिक लोग लाठी-डंडों और धारदार हथियारों के साथ पीड़ित के घर पर धावा बोल देते हैं। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, हमलावरों ने घर में घुसकर जमकर तोड़फोड़ की, गाली-गलौज की और जान से मारने की धमकियां देते हुए पूरे परिवार को आतंकित कर दिया। यह सब कुछ ऐसे हुआ मानो कानून नाम की कोई चीज उस समय मौजूद ही न हो।
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब पीड़ित पक्ष स्वयं थाने में मौजूद था, तब उनके घर पर हमला कैसे हो गया? क्या स्थानीय पुलिस की सूचना व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है, या फिर यह लापरवाही किसी बड़े खेल की ओर इशारा कर रही है? यह घटना पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाती है।
हालांकि, ग्रामीणों के साहसिक हस्तक्षेप के चलते कुछ आरोपियों को पकड़ लिया गया, लेकिन अधिकांश हमलावर मौके से फरार हो गए। पीड़ित परिवार का दावा है कि उनके पास घटना के CCTV फुटेज और ऑडियो रिकॉर्डिंग जैसे ठोस साक्ष्य मौजूद हैं, जो पूरे घटनाक्रम की सच्चाई बयां करते हैं। इसके बावजूद अब तक सख्त और निर्णायक कार्रवाई का अभाव प्रशासनिक ढिलाई को दर्शाता है।
घटना का एक और संवेदनशील पहलू यह है कि पीड़ित के बेटे की शादी 8 अप्रैल को प्रस्तावित है। ऐसे में लगातार मिल रही जान से मारने की धमकियों ने पूरे परिवार को भय और असुरक्षा के साये में जीने को मजबूर कर दिया है। क्या प्रशासन इस परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित कर पाएगा, या फिर कोई बड़ी अनहोनी होने का इंतजार किया जा रहा है?
यह घटना कुशीनगर में कानून-व्यवस्था की वास्तविक स्थिति को आईना दिखाती है। यदि समय रहते कठोर कार्रवाई नहीं की गई, तो यह स्पष्ट संकेत होगा कि अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और आम जनता असहाय।
अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले में केवल कागजी कार्रवाई करता है या फिर वास्तव में न्याय का डंडा चलाकर दोषियों को सलाखों के पीछे पहुंचाता है। जनता की निगाहें टिकी हैं—और जवाबदेही तय होना अब अनिवार्य हो चुका है।













