
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर | विशेष संवाददाता
कुशीनगर के पडरौना नगर में वर्षों से अधर में लटका रोडवेज बस स्टेशन अब आखिरकार “तेज रफ्तार” मोड में आ गया है। वजह साफ है—सख्ती की मुहर और 15 जून की तय डेडलाइन। सोमवार को पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री व राज्यसभा सदस्य कुंवर आरपीएन सिंह ने निर्माणाधीन बस स्टेशन का औचक निरीक्षण कर न सिर्फ हालात का जायजा लिया, बल्कि अधिकारियों को साफ-साफ शब्दों में चेतावनी दे डाली—“समय सीमा किसी भी हालत में नहीं टूटनी चाहिए, गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं होगा।”
निरीक्षण के दौरान माहौल पूरी तरह “एक्शन मोड” में नजर आया। सांसद ने बस स्टेशन के हर कोने को बारीकी से खंगाला—चाहे वह भवन की मजबूती हो, यात्री हाल की सुविधा हो या अधिकारियों के कक्ष की व्यवस्था। लेकिन असली सवाल तब उठे जब बात आम यात्रियों की सुविधाओं पर आई। शौचालय की स्थिति, पेयजल की उपलब्धता और बैठने की समुचित व्यवस्था को लेकर उन्होंने अधिकारियों से तीखे सवाल दागे, जिससे मौके पर मौजूद जिम्मेदारों के चेहरे पर साफ दबाव झलकने लगा।
कार्यदायी संस्था के अधिशासी अभियंता एलबी सिंह ने भरोसा दिलाया कि बस स्टेशन को आधुनिक सुविधाओं से लैस किया जाएगा। महिला और पुरुषों के लिए अलग-अलग शौचालय, स्वच्छ पेयजल, कैंटीन और अत्याधुनिक डॉरमेट्री जैसी सुविधाएं यहां उपलब्ध होंगी। खास बात यह है कि पहली मंजिल पर बनने वाली डॉरमेट्री यात्रियों के लिए राहत की बड़ी वजह बनेगी, जहां मामूली शुल्क पर रात में ठहरने की सुविधा दी जाएगी—यानि अब यात्रियों को रात में इधर-उधर भटकना नहीं पड़ेगा।

लेकिन इस पूरे निरीक्षण का सबसे अहम संदेश था—“अब लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी।” सांसद ने एआरएम जयप्रकाश प्रधान को साफ निर्देश दिए कि निर्माण कार्य की रोजाना मॉनिटरिंग हो और हर दिन की प्रगति रिपोर्ट सुनिश्चित की जाए। उनका इशारा साफ था कि अब काम “कागजों में नहीं, जमीन पर” दिखना चाहिए।
निरीक्षण के बाद पत्रकारों से बातचीत में आरपीएन सिंह ने दावा किया कि बस स्टेशन शुरू होते ही पडरौना की सबसे बड़ी समस्या—जाम—इतिहास बन जाएगी। उन्होंने कहा कि अभी तक बसें सड़कों पर खड़ी होने के कारण शहर की यातायात व्यवस्था चरमरा जाती है, लेकिन नया बस स्टेशन चालू होते ही सभी बसें परिसर के भीतर संचालित होंगी, जिससे शहर की सड़कों को बड़ी राहत मिलेगी।
पडरौना के लोगों के लिए यह परियोजना सिर्फ एक बस स्टेशन नहीं, बल्कि वर्षों की परेशानी से मुक्ति की उम्मीद बन चुकी है। अब सबकी निगाहें 15 जून पर टिकी हैं—क्या वाकई इस बार डेडलाइन पूरी होगी, या फिर यह वादा भी कागजों में सिमट जाएगा? फिलहाल, सख्ती का जो तेवर दिखा है, उसने इतना तो साफ कर दिया है कि इस बार “देरी” पर सवाल जरूर उठेंगे और जवाब भी देना पड़ेगा।
