

प्रधानाध्यापकों पर पसंदीदा लोगों से निर्माण कराने का दबाव डालने और निलंबन की धमकी देने का आरोप; विद्यालय प्रबंध समितियों की भूमिका, निर्माणकर्ता के चयन और सरकारी धन के इस्तेमाल की निष्पक्ष जांच की उठी मांग
कुशीनगर। विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर से विशेष संवाददाता।
कुशीनगर जिस अधिकारी-कर्मचारी की जिम्मेदारी विद्यालय निर्माण की गुणवत्ता पर नजर रखने की हो, यदि उसी पर निर्माण कार्य अपने प्रभाव में संचालित कराने और प्रधानाध्यापकों को कथित तौर पर धमकाने के आरोप लगने लगें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। कुशीनगर के बेसिक शिक्षा विभाग में संविदा पर तैनात डीसी निर्माण गौरव पाण्डेय को लेकर कुछ शिक्षकों द्वारा लगाए गए आरोपों ने विभागीय कार्यप्रणाली, निर्माण की पारदर्शिता और प्रशासनिक अधिकारों की सीमाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
तकनीकी निगरानी की जिम्मेदारी या निर्माणकर्ता तय करने का अधिकार?
शिक्षकों का आरोप है कि डीसी निर्माण गौरव पाण्डेय कथित तौर पर प्रधानाध्यापकों पर अपने करीबी लोगों से विद्यालय निर्माण कराने का दबाव बनाते हैं। आरोप यह भी है कि निर्देशों के अनुसार काम नहीं कराने पर कार्रवाई और निलंबन तक की धमकी दी जाती है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित अधिकारी का पक्ष सामने आना अभी बाकी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि डीसी निर्माण की भूमिका तकनीकी पर्यवेक्षण तक सीमित है, तो निर्माणकर्ता के चयन और निर्माण कार्य के संचालन में उनकी वास्तविक भूमिका क्या है? शासन की निर्धारित प्रक्रिया के तहत विद्यालय प्रबंध समिति और उसकी अधिकृत उपसमिति की जिम्मेदारियों का पालन हो रहा है या नहीं, इसकी जांच जरूरी है। तकनीकी निगरानी के नाम पर यदि किसी व्यक्ति विशेष का प्रभाव स्थापित हो रहा है, तो यह व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करेगा।

‘निलंबित करा दूंगा’—आखिर किस अधिकार से?
प्रधानाध्यापकों को निलंबन की कथित धमकी दिए जाने का मामला और भी गंभीर है। निलंबन जैसी प्रशासनिक कार्रवाई सक्षम प्राधिकारी और लागू सेवा नियमों के अनुसार होती है। ऐसे में सवाल है कि क्या डीसी निर्माण को इस प्रकार की धमकी देने या कार्रवाई का दबाव बनाने का कोई वैधानिक अधिकार प्राप्त है? यदि नहीं, तो ऐसी शिकायतों पर विभागीय अधिकारियों ने क्या संज्ञान लिया?
जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी को आरोपों की निष्पक्ष जांच कर यह स्पष्ट करना चाहिए कि संबंधित संविदाकर्मी के निर्धारित कार्य, अधिकार और जवाबदेही की सीमा क्या है।
विद्यालय समिति की भूमिका पर भी उठे सवाल
समग्र शिक्षा अभियान के तहत जर्जर विद्यालय भवनों का पुनर्निर्माण बच्चों की सुरक्षा और बेहतर शैक्षिक वातावरण के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे कार्यों में निर्माण की गुणवत्ता के साथ धनराशि का पारदर्शी उपयोग भी उतना ही जरूरी है। इसलिए यह जांच होनी चाहिए कि विद्यालयवार निर्माण किस प्रक्रिया से कराया गया, निर्माणकर्ता का चयन किसने किया और विद्यालय प्रबंध समिति की भूमिका का विधिवत निर्वहन हुआ या नहीं।
जांच केवल ईंट-सीमेंट तक सीमित न रहे!
मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच में निर्माण की गुणवत्ता के साथ स्वीकृत धनराशि, कार्यादेश, खरीद के बिल-वाउचर, भुगतान का विवरण, समिति की बैठक के अभिलेख और तकनीकी निरीक्षण रिपोर्ट भी शामिल किए जाने चाहिए। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कहीं किसी प्रधानाध्यापक पर किसी खास व्यक्ति से निर्माण कराने का दबाव तो नहीं बनाया गया।
अब जवाबदेही से नहीं बच सकते जिम्मेदार अधिकारी!
यदि आरोप जांच में सही पाए जाते हैं, तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं, संबंधित अधिकारी को भी अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। आखिर विद्यालय निर्माण शासन की निर्धारित प्रक्रिया से होगा या कथित व्यक्तिगत प्रभाव के आधार पर? यह सवाल अब विभागीय अधिकारियों के सामने है।
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर की नजर इस पूरे प्रकरण पर बनी रहेगी।
नोट: डीसी निर्माण गौरव पाण्डेय से जुड़े आरोपों के अन्य पहलुओं को लेकर विस्तृत पड़ताल अगले अंक में प्रकाशित की जाएगी।
