
वेबसाइट पर विज्ञापन प्रकाशन का दावा, अखबारों में विज्ञापन न मिलने का आरोप; अभ्यर्थियों ने सूचना देने में भेदभाव और कथित वसूली के आरोप लगाकर निष्पक्ष जांच की उठाई मांग
कुशीनगर। विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर से विशेष संवाददाता।
कुशीनगर में एजुकेटर भर्ती की काउंसलिंग को लेकर विवाद गहराता नजर आ रहा है। जिस भर्ती प्रक्रिया में मेरिट, समान अवसर और पारदर्शिता को सबसे अधिक महत्व दिया जाना चाहिए, उसी पर अभ्यर्थियों ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। आरोप है कि कुछ अभ्यर्थियों को काउंसलिंग की जानकारी नहीं मिली, जबकि चुनिंदा लोगों को सूचना देकर बुलाया गया। वहीं, विज्ञापन प्रकाशन और कथित धन वसूली से जुड़े आरोपों ने पूरे मामले को और संवेदनशील बना दिया है। अब बड़ा सवाल है—काउंसलिंग मेरिट के आधार पर हुई या कुछ अभ्यर्थियों को ही मौका देने का रास्ता अपनाया गया?
मेरिट का नियम स्पष्ट, फिर सूचना में कथित भेदभाव क्यों?
शासन की निर्धारित चयन प्रक्रिया के अनुसार संविदा एजेंसी के चयन से लेकर अभ्यर्थियों की मेरिट तैयार करने, मूल प्रमाणपत्रों के सत्यापन और काउंसलिंग तक के चरणों का पालन किया जाना है। उपलब्ध गाइडलाइन के मुताबिक शैक्षिक योग्यताओं के निर्धारित अंकों के आधार पर मेरिट तैयार करने तथा समान अंक होने पर वरीयता तय करने के नियम भी निर्धारित हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि कुशीनगर में मेरिट सूची किस आधार पर तैयार की गई? क्या सूची सार्वजनिक की गई? सभी पात्र अभ्यर्थियों को काउंसलिंग की सूचना समान रूप से भेजी गई या कुछ लोगों तक ही जानकारी सीमित रही? यदि सूचना देने में अंतर हुआ तो उसके पीछे का कारण और जिम्मेदारी तय करना जरूरी है।
काउंसलिंग के क्रम पर सवाल, रिकॉर्ड खोले तो सामने आएगी तस्वीर
निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अभ्यर्थियों को मेरिट क्रम में अवसर और उपलब्ध विद्यालयों में अपनी पसंद चुनने का मौका मिलना चाहिए। यदि किसी अभ्यर्थी के चयन के बाद विद्यालय का विकल्प भर जाता है, तो अगले अभ्यर्थी को शेष विकल्प दिए जाने की व्यवस्था है।
अभ्यर्थियों के आरोप सही पाए जाते हैं तो यह जांचना जरूरी होगा कि काउंसलिंग किस क्रम में कराई गई, किन अभ्यर्थियों को बुलाया गया और किन्हें सूचना नहीं मिली। काउंसलिंग में उपस्थित तथा अनुपस्थित अभ्यर्थियों का विवरण, सूचना भेजने के प्रमाण और विद्यालय आवंटन की सूची सामने आने से प्रक्रिया की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
एनआईसी पर विज्ञापन का जिक्र, अखबारों में प्रकाशन पर विवाद
भर्ती प्रक्रिया में विज्ञापन प्रकाशन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। अभ्यर्थियों का दावा है कि एनआईसी की वेबसाइट पर जिन समाचारपत्रों में विज्ञापन प्रकाशित होने का उल्लेख है, उनमें संबंधित विज्ञापन दिखाई नहीं दिया या प्रकाशित नहीं हुआ। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।

यदि जांच में विज्ञापन प्रकाशन संबंधी अनियमितता सामने आती है, तो यह पता लगाना होगा कि विज्ञापन वास्तव में कब और कहां प्रकाशित हुआ। इसकी मूल प्रति, प्रकाशन की तारीख और संबंधित समाचारपत्रों के प्रमाणों का सत्यापन आवश्यक है। भर्ती का उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब प्रत्येक पात्र अभ्यर्थी तक सूचना पहुंचे और सभी को आवेदन तथा चयन प्रक्रिया में समान अवसर मिले।
कथित वसूली का आरोप गंभीर, जांच से ही खुलेगा सच
मामले में कुछ अभ्यर्थियों और सूत्रों की ओर से आरोप लगाया जा रहा है कि कथित रूप से रकम लेकर कुछ लोगों को काउंसलिंग की सूचना दी गई। फिलहाल इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इसकी सत्यता का निष्कर्ष जांच और साक्ष्यों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।
फिर भी आरोप की गंभीरता को देखते हुए संबंधित एजेंसी और विभागीय कार्यालय के अभिलेखों की जांच जरूरी है। अभ्यर्थियों की सूची कब प्राप्त हुई, मेरिट किसने तैयार की, सूचना किस माध्यम से भेजी गई और चयनित अभ्यर्थियों को किस आधार पर अवसर मिला—इन सभी बिंदुओं का मिलान किया जाना चाहिए।
जिम्मेदारों से जवाबदेही तय करने की मांग
पूरे प्रकरण में मेरिट सूची, काउंसलिंग रजिस्टर, सूचना प्रेषण का रिकॉर्ड, मूल विज्ञापन, प्रमाणपत्र सत्यापन की रिपोर्ट, विद्यालय आवंटन सूची तथा जिलास्तरीय समिति की बैठक की कार्यवाही की जांच महत्वपूर्ण है। जिलाधिकारी की अध्यक्षता वाली समिति और संबंधित विभागीय अधिकारियों की भूमिका भी नियमानुसार स्पष्ट की जानी चाहिए।
अब सवाल सीधा है—यदि चयन पूरी तरह नियमों के मुताबिक हुआ है, तो मेरिट सूची और काउंसलिंग का रिकॉर्ड पारदर्शी तरीके से सामने लाने में हिचकिचाहट क्यों होनी चाहिए? निष्पक्ष जांच से ही पात्र अभ्यर्थियों को न्याय मिल सकता है और भर्ती प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों का जवाब सामने आ सकता है। आरोप सही पाए जाने पर नियमानुसार जिम्मेदारी तय हो तथा किसी भी अभ्यर्थी के साथ अन्याय हुआ हो तो उसे उचित अवसर मिले।
