
शासनादेश, आधिकारिक अभिलेख और सरकारी धन के इस्तेमाल की जांच की मांग तेज; जिलाधिकारी से पूछा—नियमों से ऊपर है निजी प्रचलन या जनता के पैसे का देना होगा हिसाब?
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर से विशेष संवाददाता।
कुशीनगर। सरकारी योजनाओं के पत्थरों पर विकास कार्यों की पहचान दर्ज होनी चाहिए या व्यक्तिगत नाम की अलग पहचान? नगर पालिका परिषद कुशीनगर में नपाध्यक्ष किरन जायसवाल के नाम को लेकर उठा विवाद अब प्रशासनिक पारदर्शिता और सरकारी धन की जवाबदेही तक पहुंचता दिखाई दे रहा है। नगर के कई विकास कार्यों के शिलापट्टों पर अध्यक्ष का नाम ‘किरन जायसवाल’ के बजाय ‘किरन राकेश जायसवाल’ अंकित होने का मामला सामने आने के बाद सवालों की बौछार शुरू हो गई है। आखिर सरकारी अभिलेखों में दर्ज नाम से अलग नाम शिलापट्टों पर किसके निर्देश पर लिखवाया गया? क्या इसके लिए सक्षम स्तर से अनुमति ली गई थी, या फिर सरकारी निर्माण कार्यों पर नाम अंकित करने की व्यवस्था को स्थानीय प्रचलन के भरोसे छोड़ दिया गया?
यह मामला किसी नाम के आगे एक शब्द जोड़ने तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि सरकारी धन से तैयार होने वाले स्थायी शिलापट्टों पर नाम दर्ज करने की प्रक्रिया क्या निर्धारित नियमों के अनुसार अपनाई गई? यदि सब कुछ नियमानुसार हुआ है, तो संबंधित आदेश और स्वीकृति सार्वजनिक करने में क्या परेशानी है? और यदि नियमों की अनदेखी हुई है, तो जवाबदेही किसकी तय होगी?

🔴 शासनादेश मौजूद, फिर शिलापट्टों पर मनमानी की गुंजाइश कहां?
नगर विकास विभाग की वेबसाइट पर 29 मई 2025 और 31 जुलाई 2025 के शिलालेख, शिलापट्ट तथा विकास कार्यों के शिलान्यास से संबंधित शासनादेशों का हवाला दिया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, जून 2026 में शिलापट्टों पर जनप्रतिनिधियों के नाम से संबंधित तस्वीरों के सत्यापन को अगली किस्त से जोड़ने वाली व्यवस्था का भी उल्लेख सामने आया है। ऐसे में संबंधित निर्देशों की वास्तविक शर्तों और उनके अनुपालन की जांच बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
यदि शासन ने नामांकन, शिलापट्ट के प्रारूप और सत्यापन को लेकर स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित की है, तो नगर पालिका प्रशासन को यह बताना चाहिए कि संबंधित कार्यों में उसका पालन कैसे सुनिश्चित किया गया। केवल यह कह देना कि नाम सामाजिक या पारिवारिक प्रचलन के अनुसार लिखा गया, सरकारी प्रक्रिया की वैधता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। हालांकि, अंतिम निष्कर्ष संबंधित शासनादेशों, आधिकारिक अभिलेखों और स्वीकृत प्रारूपों की जांच के बाद ही निकाला जा सकता है।
🔴 ‘किरन’ के साथ ‘राकेश’ कैसे जुड़ा? अनुमति का रिकॉर्ड कहां?
नगर पालिका के आधिकारिक दस्तावेजों में अध्यक्ष का नाम क्या दर्ज है और विकास कार्यों के शिलापट्टों पर कौन-सा नाम अंकित कराया गया, इसकी प्रमाणित तुलना जरूरी है। यदि दोनों में अंतर है, तो उसके पीछे प्रशासनिक आधार क्या है? क्या शिलापट्ट तैयार करने से पहले संबंधित अधिकारी ने नामों का सत्यापन किया था? क्या निर्माण एजेंसी को लिखित निर्देश दिए गए थे? क्या किसी सक्षम प्राधिकारी ने प्रारूप को मंजूरी दी थी?
इन सवालों का जवाब दस्तावेजों से मिलना चाहिए, न कि केवल मौखिक स्पष्टीकरण से। निर्वाचित प्रतिनिधि की पहचान और सरकारी परियोजना का अभिलेखीय विवरण अलग-अलग महत्व रखते हैं। इसलिए यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि नामांकन निर्धारित नियमों के अनुरूप हुआ या नहीं।
🔴 गलत शिलापट्ट लगा तो खर्च कौन उठाएगा?
मामले का सबसे गंभीर पहलू सरकारी धन की संभावित जिम्मेदारी है। यदि जांच में किसी शिलापट्ट को निर्धारित नियमों के विपरीत तैयार कराया जाना प्रमाणित होता है, तो उसे बदलने की जरूरत, उस पर होने वाले खर्च और जिम्मेदार व्यक्ति या अधिकारी की भूमिका का आकलन करना होगा।
क्या नया शिलापट्ट भी सरकारी बजट से लगाया जाएगा? यदि पहले खर्च की गई धनराशि अनावश्यक साबित होती है, तो क्या जिम्मेदारी निर्धारित होगी? नियमों और जांच के निष्कर्षों के आधार पर वसूली या अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रश्न भी उठ सकता है। हालांकि, किसी व्यक्ति पर वित्तीय अनियमितता का आरोप सिद्ध करने के लिए जांच और संबंधित साक्ष्य आवश्यक होंगे।
🔴 जिलाधिकारी से उठी निष्पक्ष जांच की मांग
अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं। जिलाधिकारी स्तर से जांच कराकर नगर के सभी संबंधित शिलापट्टों की सूची तैयार कराई जाए। प्रत्येक शिलापट्ट पर अंकित नाम, संबंधित योजना, निर्माण लागत, भुगतान अभिलेख, स्वीकृत प्रारूप और नाम सत्यापन की प्रक्रिया की पड़ताल हो। नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी की भूमिका भी अभिलेखों के आधार पर जांची जाए।
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर का सवाल स्पष्ट है—सरकारी योजनाओं के शिलापट्टों पर नाम लिखने की व्यवस्था नियमों से चलेगी या बिना स्पष्ट प्रशासनिक आधार के लिए गए फैसलों से? यदि नामांकन सही है, तो दस्तावेज सामने आएं; यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो जिम्मेदारी तय हो। जनता के पैसे से बने विकास कार्यों पर जवाबदेही की पट्टिका भी उतनी ही जरूरी है, जितनी विकास कार्यों की पहचान।
