
कुशीनगर: तमकुहीराज तहसील क्षेत्र से निकली यह तस्वीर सरकार के उन दावों पर करारा तमाचा है, जिनमें “हर गरीब को पक्का मकान” देने की बात कही जाती है। भारत सरकार की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री आवास योजना का असली लाभ जब जरूरतमंद तक नहीं पहुंच पाता, तब ऐसी घटनाएं न केवल व्यवस्था की संवेदनहीनता उजागर करती हैं, बल्कि प्रशासन की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
जनपद कुशीनगर के पटहेरवा थाना क्षेत्र की रहने वाली विधवा सुभावती पत्नी तेगा प्रजापति की कहानी किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं। शुक्रवार की रात आई तेज़ आंधी और मूसलाधार बारिश ने उसका फूस का घर उजाड़ दिया। सिर पर छत न बची तो वह अपने छोटे-छोटे बच्चों को लेकर पटहेरवा बाजार स्थित एक दुकान के आगे ओवरफ्लाई के पास कट्रेन के नीचे शरण लेने को मजबूर हो गई। पूरी रात उसने बिना भोजन और पानी के बच्चों संग ठंडी बारिश में गुज़ारी। छोटे बच्चे रोते रहे, जबकि मां बेबस निगाहों से राहगीरों की ओर देखती रही—शायद कोई मसीहा मदद को आ जाए।
विडंबना यह है कि प्रधानमंत्री आवास योजना के नाम पर सरकार बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन सुभावती जैसी जरूरतमंद विधवाएं अब भी छत के लिए आसमान निहार रही हैं। अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से बार-बार गुहार लगाने के बावजूद किसी ने उसकी सुध नहीं ली। सोशल मीडिया पर जब यह खबर वायरल हुई, तब लोगों में आक्रोश फैल गया।
गरीब विधवा सुभावती ने सोशल मीडिया के माध्यम से जिला अधिकारी कुशीनगर से गुहार लगाई है कि उसे प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास उपलब्ध कराया जाए, ताकि उसके नन्हे-मुन्ने बच्चे भी एक सुरक्षित छत के नीचे जीवन जी सकें। यह मामला न केवल एक महिला की पीड़ा है, बल्कि व्यवस्था की उस खामोशी का आईना है, जिसमें गरीबों की आवाज़ सुनाई ही नहीं देती।
