
नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत — जहां हर शब्द, हर फैसला और हर व्यवहार संविधान की मर्यादा का प्रतीक माना जाता है — वहां मंगलवार को घटी एक घटना ने पूरे न्यायिक तंत्र को हिला दिया। सुप्रीम कोर्ट की एक नियमित सुनवाई के दौरान 71 वर्षीय वकील द्वारा मुख्य न्यायाधीश (CJI) भूषण रामकृष्ण गवई की ओर जूता फेंके जाने की घटना ने पूरे देश में आक्रोश और चिंता दोनों को जन्म दे दिया है।
यह कोई साधारण हरकत नहीं थी; यह लोकतंत्र के उस स्तंभ पर प्रहार था जो न्याय, संतुलन और संवैधानिक गरिमा का प्रतीक है। न्यायालय की चारदीवारी के भीतर इस तरह का असहनीय कृत्य न केवल अदालत की अवमानना है, बल्कि उस नैतिक और सामाजिक अनुशासन पर भी प्रश्न उठाता है, जिस पर भारतीय न्याय व्यवस्था की नींव टिकी है।
घटना के चश्मदीदों के अनुसार, जब अदालत में एक सामान्य सुनवाई चल रही थी, तभी बार काउंसिल से जुड़े वरिष्ठ वकील ने अचानक से खड़े होकर ऊंची आवाज में आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं और उसके बाद जूता फेंक दिया। कोर्ट में मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने तत्काल उन्हें काबू में कर लिया। पूरा कोर्ट रूम कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध रह गया — न कोई बोला, न कोई हिला। मुख्य न्यायाधीश ने संयम बरतते हुए शांति की अपील की और न्यायिक कार्यवाही थोड़ी देर के लिए रोक दी गई।
इस घटना पर पूरे देश के न्यायविदों और सामाजिक संगठनों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। पूर्व जजों ने इसे “न्यायपालिका की गरिमा पर अभूतपूर्व हमला” बताया है, वहीं बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने आरोपी वकील की सदस्यता निलंबित करने की सिफारिश की है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल एक व्यक्ति की उग्रता नहीं, बल्कि समाज में बढ़ती असहिष्णुता और कटुता का प्रतीक है।
वहीं आम जनता में भी इस घटना को लेकर भारी असंतोष है। सोशल मीडिया पर लोग इसे “लोकतंत्र की लज्जा” कह रहे हैं। कई लोगों का कहना है कि अगर न्याय की कुर्सी तक असम्मान का निशाना बन जाएगी, तो फिर आम नागरिक न्याय की उम्मीद किससे करेगा?
यह घटना केवल एक अदालत में घटित घटना नहीं है; यह उस मानसिकता का दर्पण है, जिसमें असहमति का स्थान अब संवाद की बजाय आक्रोश ने ले लिया है। जब किसी समाज में वकील, जो संविधान और कानून के रक्षक माने जाते हैं, स्वयं मर्यादा तोड़ने लगें, तो यह लोकतांत्रिक चेतना के पतन का संकेत है।
न्यायपालिका ने इस पूरे प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा के आदेश दिए हैं। मुख्य न्यायाधीश गवई ने अपने वक्तव्य में कहा, “न्याय व्यवस्था पर विश्वास ही लोकतंत्र की आत्मा है। हम विचलित नहीं होंगे, बल्कि और दृढ़ संकल्प के साथ अपने दायित्व का निर्वाह करेंगे।”
यह वक्त केवल निंदा का नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का है। क्योंकि यदि न्याय की कुर्सी पर जूता चल सकता है, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति का अपराध नहीं — यह हमारी सामूहिक चेतना की हार है।
👉 यह घटना हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र सिर्फ अधिकारों का नहीं, बल्कि मर्यादाओं का भी नाम है — और जब मर्यादा गिरती है, तो न्याय भी घायल होता है।
