
जोधपुर हादसे से नहीं ली सीख — बिहार से दिल्ली तक जारी मौत का धंधा, एआरटीओ की मिलीभगत से चल रही अवैध बसें
जोधपुर में मंगलवार को हुए भीषण सड़क हादसे में 20 लोगों की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया। लेकिन सवाल यह है कि क्या अब भी सिस्टम जागेगा? हादसे की वजह वही पुरानी — बिना मानक, ओवरलोड और अवैध लग्ज़री बसें, जो यात्रियों की जान को दांव पर लगाकर सड़कों पर दौड़ रही हैं।
बिहार के मोतिहारी, बेतिया, मुजफ्फरपुर, गोपालगंज से लेकर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और कुशीनगर तक से रोज़ाना सैकड़ों बसें दिल्ली के लिए रवाना होती हैं। इनमें से अधिकांश के पास फिटनेस सर्टिफिकेट, वैध परमिट या बीमा तक नहीं होता। कई बस मालिक तो मानक आकार से ज़्यादा लंबाई और चौड़ाई बढ़वाकर बस तैयार कराते हैं, जिससे सड़क पर उनका संतुलन बिगड़ता है और ज़रा सी चूक पर बड़ा हादसा हो सकता है।
सूत्र बताते हैं कि इन बसों में सवारियों को ठूंस-ठूंसकर भरा जाता है, और यात्रियों की सुरक्षा को लेकर कोई व्यवस्था नहीं होती। यही नहीं, स्थानीय परिवहन विभाग और पुलिस की मिलीभगत से यह पूरा अवैध खेल चल रहा है। कुशीनगर के एआरटीओ कार्यालय पर सबसे गंभीर आरोप हैं — बताया जा रहा है कि विभाग के कुछ अफसर बिचौलियों के माध्यम से प्रति बस ₹5000 की “इंट्री फीस” वसूलते हैं। यह “सिस्टम” इतना मजबूत है कि हर माह तय रकम ऊपर तक पहुंच जाती है।
परिणाम यह है कि सरकारी राजस्व की भारी हानि हो रही है, जबकि अधिकारी आंख मूंदे बैठे हैं। न तो यात्रियों की सुरक्षा की चिंता है, न ही सड़क पर बढ़ते खतरे का डर। कई बसें तो टूरिस्ट परमिट पर या बिना किसी अनुमति के चल रही हैं, जिनकी रोकथाम के लिए किसी स्तर पर ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे।
जोधपुर हादसे जैसी घटनाएं बार-बार चेतावनी दे रही हैं, लेकिन परिवहन विभाग का रवैया ढीला ही बना हुआ है। अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो अगली बड़ी दुर्घटना कुशीनगर से दिल्ली जा रही किसी बस के यात्रियों की आखिरी यात्रा साबित हो सकती है।
अब सवाल यह है — आखिर कब रुकेगी यह मौत की रफ्तार? और क्या जिम्मेदार अधिकारी कभी जवाब देंगे?
