
बिहार हमेशा से ही सामाजिक न्याय और विकास के सपनों का प्रतीक रहा है। इस भूमि ने कई बार अपनी राजनीति में नयी राह दिखाई, लेकिन हकीकत में ये सपने अक्सर जातीय समीकरणों और राजनीतिक समझौतों की जटिलताओं में उलझ जाते हैं। 2025 के विधानसभा चुनावों की तैयारियों के बीच यह वास्तविकता फिर से उभर कर सामने आ रही है।
राजनीतिक दलों के घोषणापत्र और नेताओं के भाषणों में विकास और न्याय के सपने बिखरे हुए हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का ‘सुशासन’ और ‘विकास 2.0’, नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव का ‘अत्यंत पिछड़ा न्याय संकल्प’, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की ‘न्याय यात्रा’ – ये सभी घोषणाएं बिहार के युवाओं, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और पलायन जैसी समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने का दावा करती हैं।
नीतीश कुमार के विकास मॉडल का केंद्रबिंदु सड़क, पुल, शिक्षा और स्वास्थ्य पर निवेश है। उन्होंने ग्रामीण विकास, बिजली आपूर्ति और शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर को अपने सुशासन की पहचान बताया है। तेजस्वी यादव का फोकस पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यकों पर है, जो दशकों से राज्य की राजनीति में उपेक्षित रहे हैं। उनकी योजनाएं रोजगार सृजन, शिक्षा और स्वास्थ्य सुधार के लिए ठोस नीतियों का वादा करती हैं। वहीं, कांग्रेस और अन्य दल न्याय और समान अवसर के नारे के साथ सत्ता में आने की कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन जब बात टिकट वितरण की आती है, तो यह आदर्शवाद कहीं खो जाता है। वास्तविक राजनीति में जाति और समुदाय के समीकरण भारी पड़ते हैं। बिहार की सियासत में यह कोई नई बात नहीं है। वर्षों से नेताओं ने अपने वोट बैंक की सुरक्षा के लिए जाति आधारित समीकरण को प्राथमिकता दी है। विकास और न्याय के बड़े नारे अक्सर चुनावी रणनीति की आड़ में जातीय गणित के पीछे छिप जाते हैं।
विश्लेषक मानते हैं कि बिहार की राजनीति में जाति सिर्फ एक सामाजिक पहचान नहीं बल्कि चुनाव जीतने का प्रमुख हथियार बन चुकी है। राजद, जेडीयू, भाजपा, कांग्रेस और अन्य छोटे दल हर बार अपनी रणनीति में जाति के आधार पर सीटों का बंटवारा करते हैं। उदाहरण के लिए, यादव, कुर्मी, दलित, मौर्य और मुस्लिम जैसी जातियों को लेकर राजनीतिक दल अपनी ताकत का आकलन करते हैं और उसी हिसाब से उम्मीदवार तय करते हैं।
राजनीतिक दलों का दावा है कि यह समीकरण केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन आम जनता इसे अक्सर नकारात्मक दृष्टि से देखती है। विकास और न्याय के नाम पर किए गए वादों की सच्चाई तभी सामने आती है जब सरकारें सत्ता में आती हैं। तब यह देखा जाता है कि योजनाओं का लाभ केवल चुनिंदा क्षेत्रों और वर्गों तक सीमित रह जाता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बिहार में युवाओं का पलायन, बेरोजगारी और शिक्षा की गुणवत्ता जैसी समस्याओं के बावजूद, नेताओं का फोकस जाति आधारित समीकरण पर ज्यादा रहता है। इससे सियासत में नई पीढ़ी के लिए अवसर सीमित हो जाते हैं और सामाजिक विकास की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है।
2025 के विधानसभा चुनावों में भी यह स्थिति अलग नहीं है। जैसे ही उम्मीदवारों की सूची तैयार होती है, नारे पीछे हटते हैं और जाति का गणित सामने आता है। यह गणित न केवल सत्ता के लिए आवश्यक है बल्कि राजनीतिक दलों के लिए स्थायित्व का भी साधन बन गया है।
हालांकि कुछ नई पार्टियां जैसे जन सुराज पार्टी ने विकास और न्याय को प्राथमिकता देने की कोशिश की है। उनका दावा है कि वे जाति आधारित राजनीति से ऊपर उठकर बिहार में सभी वर्गों के लिए समान अवसर और न्याय सुनिश्चित करेंगे। लेकिन उनके पास संसाधनों और चुनावी अनुभव की कमी है, जिससे उनका प्रभाव सीमित रहता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि बिहार की सियासत में बदलाव केवल तब संभव है जब राजनीतिक दल विकास और न्याय को केवल चुनावी नारा न मानकर वास्तविक नीतियों में बदलें। इसका मतलब है शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, महिला सशक्तिकरण और युवा विकास के लिए ठोस और निष्पक्ष योजनाएं बनाना।
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि बिहार में युवाओं की बड़ी संख्या रोज़गार की तलाश में बाहर जाती है। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार होना चाहिए। सड़क, बिजली, सिंचाई और डिजिटल कनेक्टिविटी में निवेश बढ़ाने की आवश्यकता है। ये मुद्दे केवल जाति आधारित राजनीति से नहीं सुलझ सकते, बल्कि दीर्घकालिक योजना और निष्पक्ष क्रियान्वयन से ही संभव हैं।
बिहार की जनता भी अब जागरूक हो रही है। सोशल मीडिया, समाचार चैनल और नागरिक संगठन लोगों को न केवल अपने वोट के महत्व का अहसास करा रहे हैं बल्कि यह सोचने पर मजबूर कर रहे हैं कि विकास और न्याय की राजनीति में कितनी गंभीरता है।
आखिरकार, बिहार की राजनीति का असली मुकाबला यह है कि क्या दल विकास और न्याय को अपने नारे से आगे बढ़ा पाएंगे, या जाति आधारित गणित की राजनीति उनकी प्राथमिकता बनी रहेगी। चुनाव के परिणाम चाहे जो भी हों, यह साफ है कि बिहार के लोग अब केवल जाति और वोट बैंक की राजनीति से संतुष्ट नहीं हैं। उन्हें वास्तविक विकास, रोजगार और न्याय की उम्मीद है।
2025 का विधानसभा चुनाव इसलिए सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह बिहार के भविष्य की दिशा तय करने वाला मोड़ है। यदि नेता जाति और संकीर्ण राजनीतिक गणित से ऊपर उठकर वास्तविक विकास और न्याय की दिशा में कदम बढ़ाएंगे, तो बिहार न केवल सामाजिक न्याय का उदाहरण बनेगा बल्कि आर्थिक और शैक्षिक रूप से भी समृद्ध राज्य के रूप में उभरेगा।
सियासत में यह हमेशा एक चुनौती रही है कि कैसे नारे और वादे, वास्तविक नीति और निष्पादन से मेल खाएं। बिहार के लिए यह चुनौती अब और भी महत्वपूर्ण हो गई है। जनता की नजरें नेताओं पर टिकी हैं, और उनके कार्य ही तय करेंगे कि 2025 के चुनावों में किसका वर्चस्व रहेगा – जाति आधारित राजनीति का या विकास और न्याय के वास्तविक नारे का।
