

कुशीनगर/पडरौना। विकास खंड पडरौना के जंगल पिपरासी गांव में नाली निर्माण के नाम पर सरकारी धन का दुर्गंधयुक्त खेल खुलेआम चल रहा है। गांव में हो रहा निर्माण कार्य मानक के विपरीत, घटिया सामग्री से और आधे-अधूरे तरीके से कराया जा रहा है। दावा “गांव का विकास” — और हकीकत “कमीशन का विकास” दिख रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि यह पूरा खेल ग्राम प्रधान और ग्राम सचिव की सेटिंग–सिस्टम वाली जोड़ीतंत्र का नतीजा है।
ग्रामीण दो-टूक कहते हैं —
“जहां सीमेंट–कंक्रीट की मजबूत नाली चाहिए थी, वहां मिट्टी और दिखावे का तमाशा खड़ा कर दिया गया है। ईंट गिनी नहीं जा रही, कमीशन गिना जा रहा है!”
नाली की मोटाई कम, सामग्री घटिया, निगरानी नदारद — लेकिन भुगतान पूरा। कागज़ में नाली चमक रही है, जमीन पर दीवारें सीलन से पहले ही थरथरा रही हैं। गांव के लोगों का कहना है कि जिस योजना से सफाई और जल निकासी सुधरनी चाहिए थी, उसी से सरकारी खजाने की निकासी तेज हो गई है।
ग्रामीण कटाक्ष कर रहे —
“यह नाली नहीं, मलाई परियोजना है… पाइप में पानी से ज्यादा भ्रष्टाचार बह रहा है।”
गांव वालों ने आरोप लगाया कि संबंधित अधिकारियों ने आंखें मूंद ली हैं, जैसे उन्हें सिर्फ हस्ताक्षर चाहिए, हकीकत नहीं। लोग पूछ रहे हैं — सरकार तो विकास चाहती है, लेकिन जमीनी जिम्मेदार सरकार की छवि को कीचड़ में धकेलने पर क्यों आमादा हैं?
ग्रामीणों ने उच्च-स्तरीय जांच, गुणवत्तापूर्ण पुनर्निर्माण और जिम्मेदारों पर कार्रवाई की मांग की है। ग्रामीणों का आखिरी सवाल पूरे घटनाक्रम पर ताला ठोक देता है—
“नाली बनी या मलाई बंटी? जवाब कागज़ से नहीं, ज़मीन से चाहिए!”
