
📰 विलेज फास्ट टाइम्स – कुशीनगर
दिनांक – 01 नवम्बर 2025
कुशीनगर। जनपद के कई ग्राम सभाओं में “नवीन परती भूमि” अब विकास के नहीं, बल्कि कब्जों के नए अध्याय लिख रही है। ग्राम सभा की सार्वजनिक भूमि, जिस पर पंचायत भवन, खेल मैदान या तालाब होना चाहिए था, अब पक्के मकानों और दीवारों से घिरी पड़ी है — और अफसोस, राजस्व विभाग के लेखपाल इसे देख कर भी “नहीं देख रहे” हैं!
राजस्व अभिलेखों में दर्ज गाटा संख्याओं पर जबरन कब्जे और पट्टा के नाम पर धोखाधड़ी की शिकायतें आम हो चुकी हैं। ग्राम सभा कुबेरा भुआलपट्टी का मामला इसका ज्वलंत उदाहरण है — जहां गाटा संख्या 32/34 “नवीन परती” के नाम से दर्ज होने के बावजूद, लेखपाल द्वारा झूठी रिपोर्ट लगाकर कब्जाधारियों को संरक्षण दिया जा रहा है। शिकायतकर्ता बार-बार अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल “फाइल जांच में है” की घिसी-पिटी पंक्ति सुनने को मिल रही है।
⚖️ हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी – “लोकहित के विरुद्ध अपराध”
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में स्पष्ट कहा —
“ग्राम सभा की भूमि पर कब्जा केवल अवैध ही नहीं, बल्कि लोकहित के विरुद्ध अपराध है।”
न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि यदि कोई अधिकारी या राजस्वकर्मी ऐसे अतिक्रमण पर आंख मूंदे बैठा है, तो उस पर विभागीय और दंडात्मक कार्यवाही की जाए।
लेकिन कुशीनगर में सच्चाई इसके ठीक उलट है — यहां हाईकोर्ट के आदेश फाइलों में दम तोड़ रहे हैं, और जमीन पर कब्जे दिन-ब-दिन मजबूत हो रहे हैं। जनता पूछ रही है – “क्या न्याय केवल आदेशों में रह गया है?”
🧾 राजस्व संहिता की धाराएँ – कानून जो बोलता है
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 की धारा 67 के तहत, ग्राम सभा की भूमि पर कब्जा करने वाले व्यक्ति को तत्काल बेदखल किया जाना चाहिए।
और अगर कोई गरीब या भूमिहीन व्यक्ति 29 जनवरी 2012 से पहले 200 वर्ग मीटर से कम भूमि पर आवास बना चुका है, तो वह धारा 67A के अंतर्गyत नियमितीकरण के लिए आवेदन कर सकता है।
परंतु यहां मामला गरीब का नहीं, बल्कि रसूखदारों का है — जो ग्राम सभा की जमीन पर व्यवसायिक निर्माण कर रहे हैं, और राजस्व कर्मियों की मिलीभगत से “अवैध” को “वैध” में बदल रहे हैं।
💣 लेखपालों की भूमिका – ‘मौन स्वीकृति’ या ‘मिलीभगत’?
गांवों में फैलते कब्जों की असली जड़ राजस्व कर्मचारियों की मौन सहमति और लालच की गांठें हैं।
कई जगह लेखपाल खुद सीमांकन बदल देते हैं, फर्जी रिपोर्ट लगाते हैं और शिकायत आने पर कहते हैं — “अभी जांच चल रही है।”
ग्रामीणों का तंज है —
“गरीब झोपड़ी डाले तो नोटिस दो दिन में,
लेकिन जब कोई प्रभावशाली ईंट रख दे तो लेखपाल की नजर ही नहीं पड़ती!”
यह दोहरी नीति अब जनता के सब्र का इम्तहान ले रही है। सवाल है — क्या राजस्व विभाग की वर्दी पर ईमानदारी अब सिर्फ बिल्ला बनकर रह गई है?
🚨 प्रशासन की चुप्पी – बड़ी मछलियाँ अब भी आज़ाद
कुशीनगर प्रशासन दावा करता है कि अवैध कब्जों की पहचान कराई जा रही है। लेकिन हकीकत यह है कि गरीबों के झोपड़े गिराए जा रहे हैं, जबकि बड़े भू-माफिया चाय की चुस्कियों में व्यस्त हैं।
कई तहसीलों में शिकायतें राजस्व निरीक्षक तक पहुंच चुकी हैं, पर कोई उदाहरणीय कार्रवाई नहीं।
जनता कह रही है – “जब तक लेखपाल और राजस्व निरीक्षक पर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ग्राम सभा की जमीन से कब्जे नहीं हटेंगे।”
⚔️ विलेज फास्ट टाइम्स का सख्त मत
नवीन परती भूमि जनता की है, किसी “राजस्व राक्षस” की नहीं।
लेखपालों की मिलीभगत से ग्राम सभा की भूमि हड़पना राजनीतिक भ्रष्टाचार और सामाजिक विश्वासघात दोनों है।
शासन को अब धारा 67 के तहत कब्जा मुक्त अभियान चलाकर, हर ग्राम सभा की भूमि की स्थिति ऑनलाइन सार्वजनिक करनी चाहिए, ताकि जनता जान सके कि उनकी ज़मीन पर किसने कब्जा कर रखा है।
अगर राजस्व विभाग की आंखें अब भी बंद रहीं — तो आने वाले समय में गांव की जमीन पर गांव वालों का हक़ इतिहास बन जाएगा।





