


पडरौना/कुशीनगर।
घने जंगलों की निस्तब्धता, झरही नदी की कल-कल धारा और आस्था से उमड़ी भीड़—इन सबके बीच मंगलवार को बूढ़न शाह रहमतुल्लाह अलैहे के पावन रौजा पर चादरपोशी के साथ उर्स और ऐतिहासिक मेले का विधिवत शुभारंभ हुआ। मेला कमेटी के सचिव अलम मंसूरी के नेतृत्व में हुई चादरपोशी ने पूरे क्षेत्र का माहौल आध्यात्मिक शांति, कौमी एकता और सद्भाव के रंगों से भर दिया।
बूढ़न शाह का यह रौजा सदियों से हिंदू-मुस्लिम एकता का जीवंत प्रतीक रहा है। यहां आयोजित उर्स न सिर्फ आस्था का पर्व है, बल्कि उन परंपराओं का महाकुंभ है जो वर्षों से अनवरत चली आ रही हैं।
वर्षों से अखंडित आस्था—जहां नदी भी बदल देती है दिशा
जंगल शाहपुर स्थित यह रौजा एक अनोखी आध्यात्मिक विरासत से भरा है। बुजुर्गों के अनुसार हजरत बूढ़न शाह रहमतुल्लाह अलैहे सऊदी अरब के बल्क-बुखारा के राजपरिवार से संबंध रखते थे। अल्लाह की राह में मन रमने पर वे अपना राजसी जीवन त्यागकर परिवार सहित भारत आए और इस घने जंगलों वाले क्षेत्र को इबादत का मुकाम बनाया।
मान्यता है कि जब इस क्षेत्र में पानी का कोई स्रोत नहीं था, तो बाबा की दुआ पर झरही नदी स्वयं उनके समीप आ गई। आज भी यह नदी अर्धचंद्राकार रूप में रौजा को छूते हुए बहती है—ऐसा प्रवाह उत्तर प्रदेश की किसी अन्य नदी में नहीं दिखता।
किवदंतियों के अनुसार यहां स्नान करने और रौजा पर हाजिरी लगाने से असाध्य रोगों से भी मुक्ति मिल जाती है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश ही नहीं, बिहार, झारखंड, बंगाल, मध्य प्रदेश और नेपाल से भी जायरीन यहां भारी संख्या में पहुंचते हैं।
चादरपोशी के साथ एक माह चलने वाले उर्स की भव्य शुरुआत
ग्यारहवीं तिथि से प्रारंभ होकर उर्स का यह पर्व पूरे एक माह तक चलता है। तपड़ी बाबा से लेकर बूढ़न शाह के रौजे तक डेढ़ किलोमीटर लंबा पूरा इलाका दुकानों, रोशनी, मेले के शोर और श्रद्धालुओं की भीड़ से सराबोर हो जाता है।
लेकिन इस रौनक के बीच एक भयावह सच्चाई है—ऐसी सच्चाई जिसे देखकर भी अधिकारी तीन साल से आंखें मूंदे बैठे हैं।
झरही नदी पुल—15 फीट टूटी रेलिंग, 30 फीट गहरी खाई… और जिम्मेदारों की खामोशी!
उर्स के मुख्य मार्ग पर स्थित झरही नदी का पुल पिछले तीन वर्षों से मौत का जाल बना हुआ है। पुल की लगभग 15 फीट रेलिंग पूरी तरह टूटी हुई है। नीचे लगभग 30 फीट गहरी नदी, ऊपर हर रोज गुजरते हजारों लोग—लेकिन सुरक्षा शून्य।
स्थानीय लोगों के अनुसार—
कई लोग पहले ही इस टूटे हिस्से से नदी में गिरकर घायल हो चुके हैं।
कुछ दुर्घटनाओं में जानें तक जा चुकी हैं।
पुल से आने-जाने वाले 70 प्रतिशत से अधिक जायरीन इसी रास्ते का उपयोग करते हैं।
भीड़ में धक्का-मुक्की का मामूली झटका भी सीधा मौत के मुंह में गिरा सकता है।
इतना बड़ा जोखिम होने के बावजूद न विभागीय अधिकारी जागे, न जनप्रतिनिधि। शिकायतें वर्षों से की जा रही हैं, मगर पुल की मरम्मत पर किसी ने ध्यान देना जरूरी नहीं समझा।
ग्रामीणों की गुहार—“आस्था की भीड़ बढ़ रही है, पुल अभी भी खतरनाक!”
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि उर्स में लाखों की भीड़ उमड़ती है और इस पुल की स्थिति कभी भी बड़े हादसे का कारण बन सकती है।
लोगों की पीड़ा साफ है—
“मेले की रौनक से पहले सुरक्षा जरूरी है। प्रशासन कब जागेगा?”
विलेज फास्ट टाइम्स की प्रशासन से अपील—सुरक्षा इंतजाम तत्काल किए जाएं
टूटी रेलिंग की तुरंत मरम्मत
पुल पर मजबूत बैरिकेडिंग
भीड़ नियंत्रण हेतु पुलिस बल की तैनाती
रात में पर्याप्त रोशनी
मेडिकल टीम और एम्बुलेंस की व्यवस्था
यह कदम सिर्फ औपचारिकता नहीं—हजारों की जान बचाने का दायित्व है।
बूढ़न शाह का उर्स एकता का पर्व है—इसे सुरक्षित बनाना प्रशासन की पहली जिम्मेदारी।
