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दुदही ब्लॉक परिसर में प्राचीन कुएं का ‘उजागर’ होना सुंदरीकरण दावों पर तंज बन गया। कागज़ों में चमक, ज़मीन पर सन्नाटा; जिम्मेदार खामोश, सवाल गहरे, जवाब नदारद
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता की रिपोर्ट
कुशीनगर। विकासखंड दुदही के ब्लॉक कंपाउंड परिसर में सफाई अभियान के दौरान एक ऐसी सच्चाई उजागर हुई, जिसने सरकारी दावों की चमक पर सवालिया धूल जमा दी। वर्षों से झाड़ियों और कंटीले जंगल के बीच छिपा पड़ा एक बहुत पुराना कुआं अचानक तब सामने आया, जब सफाई कर्मियों ने परिसर की घनी बढ़ी वनस्पतियों को हटाया। यह वही कुआं है, जो उस दौर की गवाही देता है जब गांवों में हैंडपम्प नहीं हुआ करते थे और लोग जीवन की हर बूंद के लिए कुएं के पानी पर निर्भर रहते थे।
विडंबना देखिए—जहां एक ओर सरकार “कुआं-तालाब” के सुंदरीकरण और संरक्षण के लिए योजनाओं में धनवर्षा के दावे करती है, वहीं उसी सरकारी परिसर में इतिहास का यह जीवित साक्ष्य उपेक्षा की मार झेलता मिला। टूटी-फूटी मेहराबें, गंदगी से अटी परिधि और चारों ओर पसरा सन्नाटा… मानो यह कुआं अपनी बदहाली पर स्वयं आंसू बहा रहा हो। सवाल उठता है कि जब ब्लॉक कंपाउंड जैसी जिम्मेदार जगह पर यह हाल है, तो दूर-दराज के गांवों में विरासत की क्या स्थिति होगी?
स्थानीय कर्मचारियों और राहगीरों के बीच चर्चा गर्म है। लोगों का कहना है कि यह कुआं न सिर्फ अतीत की धरोहर है, बल्कि जल-संरक्षण के संदेश का प्रतीक भी हो सकता है। मगर अफसोस, कागज़ी योजनाओं की फाइलों में दर्ज “सुंदरीकरण” यहां धरातल पर नज़र नहीं आया। क्या योजनाएं सिर्फ बोर्ड और बैनर तक सीमित हैं?
मामला संवेदनशील है। अब निगाहें जिलाधिकारी कुशीनगर और मुख्य विकास अधिकारी कुशीनगर की ओर टिक गई हैं। क्या प्रशासन इस अनदेखी पर संज्ञान लेकर कुएं के संरक्षण व सुंदरीकरण की ठोस पहल करेगा, या फिर यह मुद्दा भी नोटिसों और आश्वासनों की ओट में दबकर रह जाएगा?
इतिहास बोल रहा है, धरोहर पुकार रही है—देखना यह है कि जिम्मेदार कुर्सियां सुनती हैं या
