

कुशीनगर/प्रयागराज। तमकुहीराज तहसील से जुड़े बहुचर्चित राजस्व विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा हस्तक्षेप करते हुए प्रशासनिक आदेशों पर करारा प्रहार किया है। कोर्ट नं.–47 में सुनवाई के दौरान माननीय न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम ने स्पष्ट किया कि राजस्व न्यायालयों के आदेश कानून की कसौटी पर टिकने चाहिए।
मामला वशिष्ठा एवं अन्य बनाम राज्य व अन्य से संबंधित है, जिसमें याचिकाकर्ताओं ने 04.10.2019 को उपजिलाधिकारी, तमकुहीराज द्वारा पारित आदेश और 26.08.2023 को अपर आयुक्त (प्रशासन), गोरखपुर मंडल के निर्णय को चुनौती दी थी। याचिका में आरोप था कि वर्ष 1963 के आदेश के विरुद्ध 50 वर्षों से अधिक समय बाद दाखिल बहाली प्रार्थना-पत्र को स्वीकार कर लिया गया, जो न्यायिक सिद्धांतों के विपरीत है।
सुनवाई के दौरान प्रतिवादी पक्ष के अधिवक्ता ने निष्पक्षता दिखाते हुए माना कि पूर्व आदेश टिकाऊ नहीं हैं और मामले को पुनर्विचार हेतु वापस भेजने का अनुरोध किया। याचिकाकर्ता पक्ष ने इस पर आपत्ति नहीं जताई।
हाईकोर्ट ने दोनों विवादित आदेशों को निरस्त (quash) करते हुए प्रकरण को पुनः उपजिलाधिकारी, तमकुहीराज के समक्ष भेज दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि बहाली प्रार्थना-पत्र पर सभी पक्षों को सुनकर, साक्ष्य का अवसर देते हुए, विधि के अनुसार छह माह के भीतर निर्णय लिया जाए।
इस फैसले ने स्थानीय प्रशासनिक कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। कानूनी हलकों में इसे न्यायिक अनुशासन और जवाबदेही का सख्त संदेश माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इतने लंबे अंतराल के बाद बहाली स्वीकार करने जैसे कदमों में अत्यधिक सतर्कता अपेक्षित है।
प्रतिक्रिया: फैसले के बाद क्षेत्र में चर्चा तेज है। आमजन और वादकारियों का कहना है कि अदालत का यह रुख न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता को मजबूत करेगा। वहीं प्रशासन के लिए संदेश साफ है—कानून से परे कोई निर्णय नहीं, हर आदेश तर्क, प्रमाण और नियमों पर आधारित होना
