

कुशीनगर। बिहार सीमा के पास बहादुरपुर चौकी क्षेत्र में दिल्ली से बिहार जा रही एक लग्जरी बस पलटने की खबर ने नहीं केवल यात्रियों को बल्कि पूरे क्षेत्र को सकते में डाल दिया। इस हादसे में दो दर्जन से अधिक यात्री घायल हुए हैं। हालांकि, इस घटना की असल कहानी बस दुर्घटना से कहीं बड़ी और गंभीर है।
जानकारी के अनुसार, बस नियमानुसार 55 यात्रियों के लिए पास थी, लेकिन उसमें 200 से अधिक यात्रियों को ठूस-ठूस कर बैठाया गया था। बस की छत पर भारी लगेज भी रखा गया था, जिससे यह यात्रियों के बजाय मालवाहक वाहन की तरह दिखाई दे रही थी। इस तरह की अनियमितताओं के बावजूद बस सड़क पर निर्बाध रूप से चल रही थी, जो सीधे तौर पर आरटीओ कुशीनगर और जीएसटी अधिकारियों की मिलीभगत को इंगित करता है।
हादसे की जाँच में यह भी सामने आया कि बस पर 24 चालान पेंडिंग थे। सवाल उठता है कि अगर इन चालानों का भुगतान करना ही आवश्यक नहीं था, तो इतने चालान क्यों बने? इसके बावजूद अधिकारियों ने बस को सड़क पर जाने दिया। हाइवे पर नियमित जाँच के दौरान भी यह बस किसी तरह से बच निकली। इस पर परिवहन ऐप में भी स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध है, जिससे स्पष्ट होता है कि सिस्टम में मौजूद अधिकारी इस अबैध संचालन में सीधा शामिल हैं।
हादसे के बाद हेतिमपुर टोल पर जीएसटी अधिकारी और आरटीओ विभाग के कर्मचारी सघन जाँच में लगे हुए हैं। लेकिन स्थानीय लोगों और यात्रियों का आरोप है कि इन अधिकारियों की जांच केवल औपचारिकता भर है और असल जिम्मेदारियों से उन्हें कोई लेना-देना नहीं।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की बसें, जिन्हें नियमानुसार 55 सीट की मंजूरी मिली है, उन्हें 160 से 200 यात्रियों के लिए चलाया जाना कानून और सुरक्षा के खिलाफ है। इसके अलावा, छत पर भारी सामान बांधकर और यात्रियों को ढोकर यह बसें दुर्घटना के लिए तैयार की जाती हैं। कुशीनगर–बिहार हाईवे पर ऐसी घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं, लेकिन इस बार यह मामला अधिकारियों और सिस्टम की मिलीभगत की वजह से गंभीर हो गया है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि बसों के संचालन के पीछे एक संगठित गिरोह है, जिसमें मंत्री के रिश्तेदारों और अधिकारी वर्ग की मिलीभगत शामिल है। सुरेंद्र और चंद्रशेखर जैसे लोग वर्षों से इस क्षेत्र में “साये की तरह” सक्रिय हैं और उनका कनेक्शन टोल प्लाजा और हाईवे के ढाबों से जुड़ा हुआ है। इस गिरोह ने अबैध तरीके से बसों का संचालन सुनिश्चित किया है और सड़क पर सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ा रखी हैं।
विशेषज्ञ और यात्री दोनों ही मानते हैं कि इस प्रणाली को रोकने के लिए एसटीएफ या एसआईटी स्तर की जांच आवश्यक है। केवल स्थानीय प्रशासन के आदेशों से स्थिति सुधारना मुश्किल है, क्योंकि इसमें अधिकारी और सिस्टम का गहरा सम्मिलन है। ऐसे में अब सवाल उठता है कि कब तक यात्रियों की जान खतरे में डाली जाएगी और कब तक घाटे में पड़े नियमों और कानूनों को नजरअंदाज किया जाएगा।
हादसे के तुरंत बाद, घायल यात्रियों को पास के अस्पतालों में भर्ती कराया गया है। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने राहत और बचाव कार्यों को तेज कर दिया है। लेकिन यह स्पष्ट है कि इस हादसे का मुख्य कारण केवल सड़क या वाहन नहीं, बल्कि सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार और अधिकारी वर्ग की मिलीभगत है।
सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की बसों को चलाना केवल गैरकानूनी नहीं, बल्कि जानलेवा भी है। यात्रियों की संख्या बढ़ाकर, छत पर भारी सामान रखकर और बिना नियमित निरीक्षण के बस चलाना, सड़क हादसों को आमंत्रित करने के समान है।
इस पूरे मामले में अब जनता और मीडिया की निगाहें प्रशासन और सरकार पर हैं। यदि जिला प्रशासन और प्रदेश सरकार ने तुरंत कदम नहीं उठाए, तो ऐसे हादसे लगातार होते रहेंगे। विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि अबैध बसों की जाँच और संचालन की जिम्मेदारी लेने वाले अधिकारियों को तुरंत जांच के दायरे में लाया जाए, ताकि सड़क पर चल रही इन घातक बसों का संचालन रोका जा सके।
अगले अंक में हम विशेष रिपोर्ट करेंगे कि कैसे सोलह, अठ्ठारह और अठाइस सीट के पास प्राप्त बसों को मेट्रो ट्रेन जैसी शकल में तैयार किया गया और चलाया जा रहा है, जिसमें केवल 55 सीट की अनुमति है। यह खुलासा करेगा कि किस तरह से सिस्टम और अधिकारी मिलकर यात्रियों की जान के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।
कुशीनगर–बिहार हाईवे हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यापक भ्रष्टाचार, अनियमित संचालन और सुरक्षा मानकों की अनदेखी का प्रतीक है। अब वक्त है कि प्रशासन, सरकार और कानून के हाथ काम में आएं और यात्रियों की जान को प्राथमिकता दी जाए।



