
संवेदनहीन प्रशासन का चेहरा बेनकाब : न्याय के लिए अनशन से जूझ रही दिव्यांग महिला
न्याय की आस में अनशनरत दिव्यांग महिला, प्रशासन मौन—संवेदनहीन सिस्टम पर सवाल, महिला सम्मान के दावे फिर बेनकाब।
इच्छामृत्यु की गुहार भी बेअसर: दबंगों के आगे बेबस दिव्यांग महिला
इच्छामृत्यु तक की गुहार अनसुनी, दबंगों के आगे लाचार दिव्यांग महिला—प्रशासनिक चुप्पी ने इंसाफ को किया शर्मसार।
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर | विशेष रिपोर्ट
महिला सम्मान, सुरक्षा और संवेदनशील शासन के बड़े-बड़े दावों की पोल खोलती एक तस्वीर आज कुशीनगर जनपद के रामकोला थाना क्षेत्र अंतर्गत सिंगहा गांव से सामने आई है। यह तस्वीर किसी पोस्टर या भाषण की नहीं, बल्कि एक दिव्यांग महिला अल्पना तिवारी की है, जो बीते चार दिनों से खुले आसमान के नीचे भूखी-प्यासी अनशन पर बैठी है। चलने-फिरने में असमर्थ अल्पना हर कदम पर सहारे की मोहताज है, लेकिन आज उसकी करुण पुकार का सहारा बनने वाला कोई नहीं दिख रहा।
यह कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं, न ही कोई दिखावटी प्रदर्शन। यह उस व्यवस्था के खिलाफ अंतिम चीख है, जो खुद को संवेदनशील और न्यायप्रिय बताती है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई में पत्थरदिल साबित हो रही है। दबंगों की दबंगई ने अल्पना तिवारी का जीवन तहस-नहस कर दिया। न्याय की आस में उसने थाने से लेकर कलेक्ट्रेट तक, अफसरों से जनप्रतिनिधियों तक, मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर देश के राष्ट्रपति तक दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन हर जगह उसे सिर्फ आश्वासन, टालमटोल और खामोशी ही मिली।
जब इंसाफ की सारी उम्मीदें टूट गईं, तो इस दिव्यांग महिला ने जीने के अधिकार से ही हाथ खींच लेने का फैसला कर लिया और राष्ट्रपति से इच्छामृत्यु की गुहार लगा दी। यह उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उस पीड़ा की पराकाष्ठा है, जहां ज़िंदगी खुद बोझ बन जाती है। इससे भी शर्मनाक यह है कि इच्छामृत्यु की अर्जी भी प्रशासन की कुंभकर्णी नींद नहीं तोड़ सकी। न कोई जिम्मेदार अधिकारी मौके पर पहुंचा, न किसी ने हालचाल जानने की ज़हमत उठाई।
चार दिनों से अनशन पर बैठी अल्पना का सूखता गला, कांपता शरीर और बुझती आंखें एक ही सवाल पूछ रही हैं—क्या दिव्यांग होना इस सिस्टम में सबसे बड़ा अपराध है? कहना गलत नहीं होगा कि अल्पना तिवारी सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि हर उस बेबस महिला के लिए लड़ रही है, जिसे दबंग कुचल देते हैं और सिस्टम अनदेखा कर देता है।
प्रशासन के लिए चेतावनी और सवाल
यदि समय रहते अल्पना तिवारी की सुनवाई नहीं हुई और अनशन के दौरान उसकी जान को कोई क्षति पहुंची, तो यह महज़ एक घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता से उपजा गंभीर अन्याय माना जाएगा। अब भी वक्त है कि जिला प्रशासन, पुलिस और जनप्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारी निभाएं, मौके पर पहुंचकर निष्पक्ष जांच, त्वरित राहत और न्याय सुनिश्चित करें।
यदि यह पुकार भी अनसुनी रही, तो साफ हो जाएगा कि महिला सम्मान सिर्फ मंचों और नारों तक सीमित है, जबकि ज़मीनी हकीकत में इंसानियत को भूखा-प्यासा मरने के लिए छोड़ दिया गया है।

