
विलेज फास्ट टाइम्स न्यूज नेटवर्क | उत्तर प्रदेश
सेवरही निवासी आयुष कुमार पर लखनऊ में हमला, कैमरा लूटा
तमकुहीराज/कुशीनगर। लोकतंत्र में सवाल पूछना क्या अब जोखिम भरा पेशा बनता जा रहा है? यह सवाल उस समय और भी गूंज उठा जब सेवरही (जनपद कुशीनगर) निवासी युवा पत्रकार आयुष कुमार पर लखनऊ में आयोजित एक कथित “शांतिपूर्ण” विरोध प्रदर्शन के दौरान जानलेवा हमला कर दिया गया।
बताया जा रहा है कि ईरान के सुप्रीम लीडर Ali Khamenei की मौत की खबर के बाद राजधानी लखनऊ में विरोध प्रदर्शन किया जा रहा था। आयुष कुमार अपने कैमरापर्सन के साथ घटनास्थल पर कवरेज करने पहुंचे थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जैसे ही पत्रकार ने प्रदर्शनकारियों से कुछ तीखे सवाल पूछने की कोशिश की, माहौल अचानक भड़क उठा।
सैकड़ों की भीड़ ने दोनों मीडियाकर्मियों को घेर लिया। माइक छीना गया, कैमरा जबरन लूट लिया गया और दोनों के साथ बेरहमी से मारपीट की गई। आयुष कुमार गंभीर रूप से घायल हुए, जबकि उनके सहयोगी कैमरापर्सन को भी चोटें आईं। लूटा गया कैमरा अब तक बरामद नहीं हो सका है।
अगर प्रदर्शन शांतिपूर्ण था, तो सवालों से इतनी घबराहट क्यों? क्या अब लोकतंत्र में जवाबदेही से बचने के लिए भीड़तंत्र का सहारा लिया जाएगा? यह घटना केवल एक पत्रकार पर हमला नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा प्रहार है।
स्थिति तब और भयावह हो गई जब जान का वास्तविक खतरा महसूस होने लगा। मौके पर मौजूद 3-4 स्थानीय नागरिकों ने साहस दिखाते हुए हस्तक्षेप किया और दोनों मीडियाकर्मियों को भीड़ से सुरक्षित बाहर निकाला। समय रहते मदद न मिलती तो अंजाम कहीं ज्यादा गंभीर हो सकता था।
प्रशासन से मांग की गई है कि घटना की निष्पक्ष जांच कर दोषियों की पहचान की जाए, लूटा गया कैमरा बरामद किया जाए और हमलावरों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
लोकतंत्र में सवाल पूछना गुनाह नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। यदि सवालों से असहजता है, तो जवाब दीजिए—लाठियां क्यों चल रही हैं? उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था पर यह एक बड़ा सवाल है, जिसका जवाब अब प्रशासन को देना होगा।
