
देश के मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य पर आदरणीय विजय राय जी द्वारा लिखा गया लेख केवल एक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक गहरी चेतावनी है — वह चेतावनी जिसे सुनना, स्वीकारना और समझना आज हर नागरिक की जिम्मेदारी है। उनके लेख ने भ्रष्टाचार की उस सच्चाई को उजागर किया है जिसे हम सभी अपनी आंखों से देखते हैं, परंतु दिल से स्वीकारना नहीं चाहते। इसी लेख को आधार बनाकर प्रस्तुत है मेरा विस्तृत संपादकीय विचार —
भ्रष्टाचार : देश के विकास का सबसे बड़ा दुश्मन, और हम सब इसके सहभागी
भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रों में से एक है, परंतु दुखद सच यह है कि इसी लोकतंत्र की जड़ें भ्रष्टाचार से अंदर तक खोखली हो चुकी हैं। देश की उन्नति, सामाजिक न्याय और प्रशासनिक पारदर्शिता—सब कुछ इसी एक बीमारी के बोझ से जकड़ा हुआ है।
विजय राय जी ने बिल्कुल सही लिखा है कि भ्रष्टाचार पर केवल तंज कसना ही काफी नहीं, इसे स्वीकार करना भी जरूरी है कि इस स्थिति के लिए सिर्फ सरकारें नहीं, बल्कि हम सभी जिम्मेदार हैं।
आज एक ईमानदार नागरिक जब किसी सरकारी दफ्तर में कदम रखता है, तो उसकी ईमानदारी का पहला इम्तिहान वहीं से शुरू हो जाता है। सौ रुपये के काम का पाँच हजार रूपये मांगा जाना कोई नई बात नहीं, यह तो अब रोजमर्रा का हिस्सा बन चुका है। बेबस नागरिक अंत में पैसे देकर काम करा लेता है। और यही से भ्रष्टाचार का दुष्चक्र जन्म लेता है—
इमानदार भी मजबूरी में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले सिस्टम का हिस्सा बन जाता है।
राजनीति का रूपांतरण : सेवा से सत्ता तक का सफर, और सत्ता से संपत्ति का नया खेल
देश में अच्छे नेताओं की कमी नहीं है; कमी है तो उन्हें पहचानने की। जमीनी स्तर पर कई नेता समर्पित भाव से जनता की सेवा करना चाहते हैं, पर चुनाव आते ही उनकी मेहनत पर पानी फिर जाता है।
चुनावी राजनीति अब विचारधारा या जनसेवा की नहीं रह गई—
यह खर्च, जाति समीकरण और संगठन की चतुराई का खेल बन चुकी है।
अच्छा नेता दरकिनार किया जाता है
पैसा रखने वाला आगे बढ़ाया जाता है
जाति का गणित चरित्र से ज्यादा महत्व रखता है
टिकट विचारधारा नहीं, खर्च क्षमता देखकर बांटा जाता है
और जब वही नेता मोटा खर्च करके जीतता है, तो वह अपनी जीत में लगे पैसे की वसूली करने के लिए सिस्टम पर दबाव डालता है।
अधिकारी नेता की तरफ देखते हैं, नेता अधिकारी की तरफ—and अंत में पिसता है सिर्फ आम आदमी।
यही कारण है कि सत्ता बदलती है पर सिस्टम नहीं बदलता।
मोदी युग की उम्मीदें और कड़वी हकीकत
जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी सत्ता में आए, तो जनता को यह भरोसा हुआ कि अब सरकारी व्यवस्था में क्रांति आएगी, भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी, ईमानदारी को सम्मान मिलेगा।
कुछ सुधार हुए—
परंतु भ्रष्टाचार की वह पुरानी जड़ें इतनी गहरी थीं कि उन्हें निकालने में कोई भी सरकार असफल साबित हुई। कई स्थानों पर स्थिति उलटी और बदतर भी हुई।
सच यह है कि किसी एक नेता, एक सरकार, या एक एजेंसी से चमत्कारी बदलाव नहीं आते।
व्यवस्था तभी बदलती है जब समाज बदलता है।
विदेशों से सीख: सरल चुनाव, सादगीपूर्ण राजनीति, जवाबदेह व्यवस्था
विजय राय जी के विचार बिल्कुल सही हैं कि विदेशों में चुनाव प्रणाली सरल है।
खर्च लगभग न के बराबर
पढ़े-लिखे, पेशेवर लोग राजनीति में आते हैं
चुनाव हारने के बाद वे अपने व्यवसाय में लौट जाते हैं
राजनीति दबदबा नहीं, सेवा का माध्यम है
जबकि भारत में—
ठाठ-बाठ
करोड़ों की शोहरत
बिना स्पष्ट आय के आलीशान जीवन
चुनाव में अंधाधुंध खर्च
और उस खर्च की वसूली के लिए भ्रष्टाचार
इन सबने राजनीति को व्यवसाय, और जनता को ग्राहक बना दिया है।
जमीनी नेताओं का संघर्ष और टूटते सपने
आज हजारों युवा नेता हैं जो गांव-गांव मेहनत करते हैं।
लेकिन टिकट मिलने की बारी आती है तो—
जाति का समीकरण
धनबल
राजनीतिक लॉबी
सब उनकी मेहनत पर भारी पड़ जाते हैं।
उनका राजनीतिक करियर शुरू होने से पहले ही खत्म कर दिया जाता है।
और सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि
देश के अच्छे नेता राजनीति छोड़ देते हैं और राजनीति बुरे हाथों में चली जाती है।
क्या अब एक नई क्रांति की आवश्यकता है?
आजादी से पहले हजारों लोग फांसी पर चढ़ गए, लाखों ने जान दे दी।
जेपी आंदोलन ने सत्ता की जड़ें हिला दीं।
अन्ना हजारे के आंदोलन ने करोड़ों लोगों में उम्मीद जगाई।
तो क्या भ्रष्टाचार मिटाने के लिए एक नए जन-आंदोलन की जरूरत है?
शायद हाँ।
मगर सवाल यह है—
कौन आगे आएगा?
कौन परिवार से दूर रहकर संघर्ष करेगा?
कौन जोखिम उठाएगा?
कौन भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में कीमत चुकाने को तैयार होगा?
देश का भविष्य इन्हीं सवालों में अटका हुआ है।
निष्कर्ष : बदलाव शुरू होता है एक व्यक्ति से, एक निर्णय से, एक साहस से
भ्रष्टाचार कोई बाहरी हमला नहीं—यह समाज की आंतरिक कमजोरी है।
इसे मिटाने के लिए जरूरी है—
चरित्र
साहस
सामाजिक चेतना
राजनीतिक ईमानदारी
प्रशासनिक पारदर्शिता
एक नई क्रांति की शुरुआत जरूरी है—
लेकिन वह क्रांति सड़क पर उतरकर नहीं,
चरित्र में उतरकर शुरू होगी।
जब तक भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा,
देश कितनी भी योजनाएँ बना ले, कितनी भी सड़कें बना ले, कितने भी भाषण दे ले—
असली उन्नति संभव नहीं।
देश तब विकसित होगा जब नागरिक ईमानदार होगा,
सिस्टम जवाबदेह होगा,
और राजनीति सेवा बनेगी, सत्ता का व्यवसाय नहीं।
इसी चेतावनी, इसी उम्मीद और इसी संकल्प के साथ —
यह देश अभी भी बदल सकता है।
यदि हम बदलने की हिम्मत करें।
— संपादक
विलेज फास्ट टाइम्स
कुशीनगर
