
विलेज फास्ट टाइम्स, लक्ष्मीगंज/कुशीनगर
प्रदेश सरकार भले ही हर किसान को डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने और फार्मर आईडी अनिवार्य करने का दावा कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयान कर रही है। किसानों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई यह व्यवस्था, अब किसान भाइयों के लिए सिरदर्द बन चुकी है।
जनपद कुशीनगर के कप्तानगंज तहसील अंतर्गत अनेक गाँवों में किसानों को फार्मर आईडी बनने में ऐसी-ऐसी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है कि वे विभागीय दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर थक चुके हैं। पर समाधान?— शून्य!
नाम मिसमैच: किसान परेशान, सिस्टम खामोश
सबसे बड़ी समस्या सामने आ रही है—
आधार कार्ड और खतौनी में नाम का मिलान न होना।
कहीं अक्षर अलग, कहीं पिता का नाम अलग, कहीं सरनेम बदल गया— और सिस्टम तुरंत “Rejected” बता देता है।
किसान गरीब, देहाती, पढ़ा-लिखा नहीं… उनसे यह तकनीकी कठोरता कैसे संभले?
कई किसान कहते भी दिखाई दे रहे हैं—
“हम खेत में मेहनत करें या दफ्तरों में चक्कर लगाएँ? सरकार सुविधा दे रही है या परेशानी?”
खतौनी में नाम अंकित कराने का आदेश – लेकिन फिर भी आईडी नहीं!
जिन किसानों के नाम खतौनी में दर्ज कराने का निर्देश हुआ है, उनके मामले में भी पोर्टल स्वीकार नहीं कर रहा।
किताब में नाम है, लेकिन पोर्टल पर नहीं…
कितने किसान तो महीनों से चक्कर लगाकर भी वहीं खड़े हैं, जहाँ से शुरू हुए थे।
सबसे बड़ी विसंगति – पूरी की पूरी ग्रामसभाएँ पोर्टल से गायब!
प्राप्त सूचना के अनुसार कप्तानगंज तहसील की खोटही, धोधरही, परसौनी, कुसमही, मोरवन और पकड़ी बांगर जैसी ग्रामसभाएँ सरकारी पोर्टल पर उपलब्ध ही नहीं हैं!
यानी, इन गाँवों में रहने वाले किसानों का फार्मर आईडी बनना तो दूर, उनका डिजिटल अस्तित्व ही पोर्टल पर नहीं दिख रहा।
यह स्थिति किसानों की परेशानी को कई गुना बढ़ा देती है।
इन गांवों के किसान रोज ऑफिसों में पहुँचते हैं—
कभी कृषि विभाग, कभी लेखपाल, कभी CSC केंद्र…
लेकिन हर तरफ एक ही जवाब—
“अभी पोर्टल अपडेट नहीं हुआ। इंतज़ार करें।”
सरकार गाँव-गाँव डिजिटल इंडिया बनाने की बात करती है, पर जब पूरा गाँव ही सिस्टम में दिखाई न दे, तो किसान आखिर क्या करें?
बढ़ती नाराज़गी – किसान संगठन का बड़ा बयान
भारतीय किसान यूनियन (जनकल्याण) के प्रदेश अध्यक्ष रामचन्द्र सिंह ने इसे गंभीर लापरवाही करार दिया है।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा—
“सरकार किसानों को लाभ पहुँचाने की बात करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर किसान लाभ लेने की जगह परेशानियों में उलझा हुआ है। जब तक इन तकनीकी समस्याओं का समाधान नहीं होगा, तब तक किसान फार्मर आईडी का लाभ कैसे पाएगा?”
भाकियू (जनकल्याण) ने उत्तर प्रदेश सरकार और कुशीनगर के संबंधित अधिकारियों से मांग की है कि…
मिसमैच नाम की समस्या का त्वरित समाधान किया जाए
खतौनी अपडेट वाले किसानों के आईडी तत्काल बनाए जाएँ
पोर्टल से गायब ग्रामसभाओं को तुरंत जोड़ा जाए
किसानों को दफ्तर-दफ्तर भटकने से राहत मिले
आशा बनाम वास्तविकता
सरकार कहती है— हर किसान को डिजिटल पहचान मिलेगी
लेकिन किसान कहता है— पहले सिस्टम तो ठीक करो!
फार्मर आईडी के बिना किसान न सब्सिडी ले पा रहा, न योजनाओं का लाभ। परिणामस्वरूप, किसान की उम्मीदें और समस्याएँ दोनों तेजी से बढ़ रही हैं।
अंततः सवाल यही है:
जब किसान की पहचान ही पोर्टल पर नहीं बनेगी, तो किसान कैसे आगे बढ़ेगा?
