
5 साल बाद भी बहादुरगंज की सड़कों पर ‘विकास’ पानी-पानी — अधिकारी मौन, सफाई कर्मी गायब, प्रधान पर सवाल
04 नवंबर, विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर
कुशीनगर।
विकासखंड पडरौना की ग्राम सभा बहादुरगंज में “विकास की गंगा” अब गंदे नालों के पानी में तैर रही है। चुनावी वादों के पांच साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन गांव की सड़कों पर जमा बदबूदार पानी आज भी शासन-प्रशासन के दावों की पोल खोल रहा है।
मुख्य मार्ग से लेकर गलियों तक हर जगह नालियों का गंदा पानी भरा है। लोग मजबूर हैं कि उसी सड़ी हुई सड़क से होकर गुज़रें — जहां गंदगी, मच्छरों और दुर्गंध ने स्थायी डेरा जमा लिया है। गांववाले कहते हैं, “हमने विकास के नाम पर सिर्फ नारे सुने हैं, हकीकत में कुछ नहीं बदला।”
गांव के लोगों ने कई बार अधिकारियों और ग्राम प्रधान से शिकायत की, लेकिन न तो सफाई हुई, न नालियों की मरम्मत। सफाई कर्मी महीनों से लापता हैं, और गांववाले कहते हैं — “हमें तो सफाई कर्मी का चेहरा तक नहीं पता। बस प्रधान के दरवाजे पर आते हैं, साइन करके चले जाते हैं।”
प्रधान पर उठ रहे सवाल
ग्राम प्रधान पर आरोप है कि पांच वर्षों में विकास के नाम पर जो बजट आया, उसका लाभ ज़मीनी स्तर तक नहीं पहुंचा। स्वच्छ भारत मिशन की योजनाएं केवल कागज़ों में सीमित रह गईं। गली-नाली की सफाई, सड़क मरम्मत और पेयजल निकासी जैसी बुनियादी व्यवस्थाएं ठप पड़ी हैं। गांव के लोगों का कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच कराई जाए तो “विकास का पैसा बंदरबांट में चला गया है।”
विवाद और नाराज़गी का माहौल
गंदे पानी के कारण कई बार गांव में विवाद तक की नौबत आई। लोग नाली के पानी को रोकने और रास्ता साफ कराने को लेकर आमने-सामने हो जाते हैं। बावजूद इसके, कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। ग्रामीणों का कहना है कि अधिकारी सिर्फ कागज़ी रिपोर्ट तैयार कर अपने दायित्व की इतिश्री कर लेते हैं।
स्वच्छ भारत मिशन की उड़ रही धज्जियां
प्रधानमंत्री द्वारा शुरू की गई स्वच्छ भारत मिशन की आत्मा बहादुरगंज में दम तोड़ती नज़र आ रही है। गंदगी, जलभराव और बदबूदार माहौल ने साफ कर दिया है कि यहां विकास नहीं, “बेहिसी” राज कर रही है।
जनता अब सवाल पूछ रही है — आखिर जवाबदेही किसकी?
गांववाले अब खुलकर सवाल उठा रहे हैं कि आखिर पांच साल में क्या हुआ? गली-नाली से लेकर सड़क तक वही हालत क्यों है? ग्राम प्रधान से लेकर सफाई कर्मी तक हर कोई जिम्मेदारी से भागता दिख रहा है।
बहादुरगंज आज उस कटु सच्चाई का उदाहरण है जहां योजनाएं बनती हैं, फाइलें चलती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत वही रहती है — सड़कों पर तैरता पानी और विकास के नारों में डूबता जनविश्वास।
