
कुशीनगर। जनपद के पड़रौना नगर सहित कसया, हाटा, तमकुहीरोड और सेवरही के बाजारों में खुलेआम एमआरपी कानून को ठेंगा दिखाया जा रहा है। पांच और दस रुपये एमआरपी अंकित पाउच—जैसे कमला पसंद और रजनीगंधा—सहित विभिन्न कंपनियों की सिगरेटें दो से पांच रुपये अधिक दाम पर बेची जा रही हैं। पैकेट पर पुरानी कीमत साफ छपी है, फिर भी ग्राहकों से अतिरिक्त वसूली हो रही है। सवाल सीधा है—जब अधिकतम खुदरा मूल्य अंकित है, तो अतिरिक्त रकम किस आधार पर?
दुकानों पर पूछने पर एक जैसा जवाब मिलता है—“रेट बढ़ गया है” या “सप्लाई महंगी आ रही है।” लेकिन बाजार जानकारों का कहना है कि जब तक कंपनी पैकेट पर नई कीमत नहीं छापती, एमआरपी से ऊपर वसूली अवैध है। उपभोक्ता संरक्षण नियम और लीगल मेट्रोलॉजी कानून साफ कहते हैं कि एमआरपी से अधिक कीमत लेना दंडनीय अपराध है। इसके बावजूद बाजार में यह ‘दो-तीन रुपये की छोटी बढ़ोतरी’ अब रोज़ की हकीकत बन चुकी है।

छोटी रकम, बड़ा खेल
स्थानीय व्यापारियों के मुताबिक रोजाना हजारों पाउच और सिगरेट पैकेट बिकते हैं। यदि प्रति पैकेट औसतन तीन रुपये अतिरिक्त वसूले जाएं, तो महीने के अंत तक यह रकम लाखों में पहुंचती है। यही वजह है कि दो से पांच रुपये की ‘मामूली’ बढ़ोतरी अब सुनियोजित मुनाफाखोरी का मॉडल बनती दिख रही है। उपभोक्ता अक्सर इतनी छोटी राशि पर बहस नहीं करता, और यही चुप्पी इस खेल को ताकत देती है।
डिस्ट्रीब्यूटर स्तर पर असली ‘मैनेजमेंट’?
सूत्रों का दावा है कि असली खेल डिस्ट्रीब्यूटर स्तर पर रचा जा रहा है। आरोप है कि कुछ डिस्ट्रीब्यूटर गोदामों में स्टॉक रोककर रखते हैं और बाजार में सीमित सप्लाई छोड़ते हैं, जिससे कृत्रिम किल्लत बनती है। खुदरा दुकानदार ऊंचे दाम पर माल उठाते हैं और अंततः बोझ उपभोक्ता पर डाल देते हैं। यदि यह सच है, तो यह सिर्फ एमआरपी उल्लंघन नहीं, बल्कि जमाखोरी और बाजार में कृत्रिम संकट पैदा करने जैसा गंभीर मामला है।
कोरोना काल का दोहराव?
बाजार के पुराने खिलाड़ी बताते हैं कि यह पैटर्न नया नहीं। कोरोना काल में भी लॉकडाउन और परिवहन बाधा का हवाला देकर स्टॉक रोका गया, फिर ऊंचे दाम पर माल उतारा गया। तब भी लाखों की अतिरिक्त कमाई के आरोप लगे थे। अब परिस्थितियों का नाम बदल गया है, लेकिन रणनीति वही नजर आती है—सप्लाई नियंत्रित करो, दाम ऊपर रखो, और जिम्मेदारी से बचो।

प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन और बाट-माप विभाग की भूमिका पर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। क्या डिस्ट्रीब्यूटर गोदामों की औचक जांच हुई? क्या स्टॉक रजिस्टर और बिक्री बिलों का मिलान किया गया? क्या खुदरा दुकानों पर एमआरपी से अधिक वसूली पर मौके पर चालान काटे गए? यदि नहीं, तो क्यों? कानून में जुर्माना, लाइसेंस निरस्तीकरण और आपराधिक कार्रवाई तक का प्रावधान है, फिर सख्ती नदारद क्यों?

उपभोक्ताओं की प्रतिक्रिया
स्थानीय उपभोक्ताओं का कहना है कि छोटे उत्पादों पर इस तरह की अतिरिक्त वसूली आम हो चुकी है। “दो रुपये ज्यादा क्या है”—यही सोच इस सिंडिकेट की ढाल बन गई है। लेकिन यही ‘छोटी लूट’ जब हजारों पैकेटों पर रोज लागू होती है, तो यह संगठित आर्थिक शोषण का रूप ले लेती है। लोगों ने प्रशासन से निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई की मांग की है।
जवाबदेही तय हो
यदि कंपनियों ने कीमत नहीं बढ़ाई और पैकेट पर पुरानी एमआरपी ही अंकित है, तो अतिरिक्त वसूली सीधी-सीधी धोखाधड़ी है। और यदि सप्लाई वास्तव में महंगी हो गई है, तो नई कीमत पैकेट पर अंकित क्यों नहीं? पारदर्शिता के बिना ‘रेट बढ़ गया’ कहना सिर्फ बहाना माना जाएगा।

अब नजर प्रशासनिक कार्रवाई पर है। क्या औचक निरीक्षण होंगे? क्या गोदामों के ताले खुलेंगे? क्या स्टॉक और बिलों का मिलान होगा? या फिर एमआरपी कानून की धज्जियां उड़ती रहेंगी और दो से पांच रुपये की यह ‘छोटी चोट’ लाखों के खेल में बदलती रहेगी?
कुशीनगर का उपभोक्ता जवाब चाहता है—और इस बार सिर्फ आश्वासन नहीं, ठोस कार्रवाई।

