




कुशीनगर, रामकोला।
सरकार के स्वास्थ्य सेवाओं के बड़े-बड़े दावों के बावजूद कुशीनगर के ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) पूरी तरह विफल नजर आ रहे हैं। रामकोला ब्लॉक के मोरवन गांव का पीएचसी इसका एक उदाहरण है। यहां हालात इतने खस्ता हैं कि अस्पताल पूरी तरह भगवान भरोसे चल रहा है।
मोरवन पीएचसी में न तो डॉक्टर तैनात हैं और न ही फर्मासिस्ट। दो लैब टेक्नीशियनों में से एक को रामकोला सीएचसी पर अटैच कर दिया गया है। नतीजतन, मरीजों की जांच और इलाज की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। अस्पताल में दवाइयों की भी किल्लत है।
ग्रामीणों का कहना है कि छोटे-मोटे बीमारियों के लिए भी उन्हें निजी अस्पताल या झोलाछाप डॉक्टरों का सहारा लेना पड़ता है। कई बार तो मरीज खाली हाथ लौट जाते हैं, क्योंकि न तो डॉक्टर हैं, न दवा। इस स्थिति ने ग्रामीणों में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर निराशा और आक्रोश दोनों पैदा कर दिया है।
स्थानीय निवासी श्रीमती गीता देवी ने कहा, “बुखार या सामान्य सर्दी-जुकाम में भी हमें बाहर जाकर इलाज करवाना पड़ता है। सरकारी अस्पताल खाली खड़ा है, और हमारी तकलीफें बढ़ती जा रही हैं।”
स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि डॉक्टरों की कमी और तकनीकी कर्मचारियों की अनुपस्थिति के कारण मोरवन पीएचसी में यह स्थिति बनी है। लेकिन ग्रामीणों का मानना है कि यह सिर्फ बहाने हैं, जबकि सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं लोगों तक पहुंचाने में पूरी तरह विफल साबित हो रही हैं।विशेषज्ञों के अनुसार, ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों की यह स्थिति देशभर में आम समस्या बनती जा रही है।
