







दुदही (कुशीनगर)। दुदही ब्लॉक परिसर में वर्षों पूर्व निर्मित मॉडल कुआं इन दिनों प्रशासनिक कार्यशैली पर तीखा सवाल बनकर खड़ा है। संरक्षण और सुंदरीकरण की उम्मीद लगाए बैठा यह कुआं अचानक जेसीबी मशीन की गड़गड़ाहट में गुम हो गया। जानकारी के अनुसार, जर्जर हालत का हवाला देते हुए कुएं को सुधारने के बजाय मिट्टी भरकर पाट दिया गया—मानो समस्या का समाधान नहीं, सबूत का अंत ही लक्ष्य हो।







सूत्र बताते हैं कि मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) के संभावित निरीक्षण की सुगबुगाहट ने ब्लॉक दफ्तर में असामान्य सक्रियता ला दी। आनन-फानन में परिसर की साफ-सफाई, रंग-रोगन और व्यवस्थाओं को “चमकाने” का अभियान शुरू हुआ। इसी हड़बड़ी में वर्षों से उपेक्षित पड़े मॉडल कुएं की जर्जर तस्वीर से बचने का सबसे तेज़ रास्ता चुना गया—जेसीबी बुलाकर उसे मिट्टी में दफना देना। सवाल उठता है कि यदि ढांचा असुरक्षित था तो तकनीकी जांच, प्रस्ताव और जीर्णोद्धार की प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह कदम विकास कार्यों की वास्तविक स्थिति छिपाने की कवायद का हिस्सा है। ग्रामीणों का कहना है, “यदि कुआं खराब था तो उसे ठीक कराइए, इतिहास मिटाइए मत।” वहीं, बिना सार्वजनिक सूचना या औपचारिक प्रस्ताव के की गई कार्रवाई पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
इधर, निरीक्षण की तैयारियों के नाम पर ब्लॉक परिसर में सफाई कर्मियों की फौज तैनात कर दी गई है। गांवों में तैनात अधिकांश सफाई कर्मियों को मुख्यालय पर बुला लेने से ग्रामीण क्षेत्रों की नियमित सफाई व्यवस्था प्रभावित होने लगी है। ग्रामीणों की नाराज़गी साफ झलकती है—“सफाई दिखावे के लिए नहीं, व्यवस्था के लिए होनी चाहिए।”
प्रशासनिक हलकों में अब यह चर्चा तेज़ है कि क्या इस प्रकरण में जिम्मेदारी तय होगी? क्या तकनीकी स्वीकृति, अभिलेख और प्रक्रिया का पालन हुआ? या फिर निरीक्षण गुजरते ही सब कुछ फिर पुराने ढर्रे पर लौट जाएगा? फिलहाल, मॉडल कुआं मिट्टी के नीचे है और जवाबदेही का सवाल हवा में तैर रहा है।
