
डीएम-सीडीओ कार्यालय के सामने नियम ताक पर, ठेकेदार मनमानी पर उतरे—अफसरों की चुप्पी से भ्रष्टाचार को मिल रहा खुला संरक्षण।
निगरानी ठप, गुणवत्ता नदारद—पाँच करोड़ की परियोजना पर उठे गंभीर सवाल, भ्रष्टाचार की गंध से प्रशासनिक दावे कटघरे में।
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर
कुशीनगर। प्रशासनिक ईमानदारी की चौखट कहे जाने वाले कलेक्ट्रेट परिसर के ठीक सामने यदि करोड़ों रुपये की परियोजना गुणवत्ता, मानकों और पारदर्शिता से कोसों दूर दिखाई दे, तो यह सिर्फ विकास कार्यों की विफलता नहीं, बल्कि व्यवस्था की जड़ तक पहुंच चुकी खामियों और संभावित भ्रष्टाचार की चुभती हुई तस्वीर है।

रविन्द्रनगर स्थित बुद्धा पार्क में करीब पांच करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से व्यायामशाला, कार्यालय, गोदाम व पाथ-वे सहित कई निर्माण कार्य प्रगति पर बताए जा रहे हैं, परंतु धरातल की सच्चाई इन दावों को न सिर्फ झुठलाती दिखती है, बल्कि सरकारी धन की बर्बादी और जिम्मेदारों की उदासीनता को बेनकाब करती नजर आती है। जिस स्थान से कानून व्यवस्था, जिलास्तरीय विकास और जवाबदेही की धार तय होती है, उसी के साये में यदि मानकों की धज्जियाँ उड़ें और अफसरों की निगाहें तिरछी साबित हों—तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह मौन निरीक्षण की मजबूरी है या मिलीभगत की परिणति?

मानकों का मखौल, निगरानी नदारद — बुद्धा पार्क बना सवालों का केंद्र
निर्माणाधीन ढांचे को देखने भर से यह स्पष्ट हो जाता है कि तकनीकी मानदंडों और गुणवत्ता नियंत्रण की अनिवार्य प्रक्रियाएं कागज़ों में उलझकर रह गई हैं। मौके पर न गुणवत्ता जांच से संबंधित सूचना बोर्ड, न कार्यदायी संस्था का पूरा विवरण, और न ही अभियंता अथवा संबंधित अधिकारियों की सतत उपस्थिति—यह सब मिलकर पारदर्शिता की जगह धुंधलके का माहौल तैयार करते हैं। जानकारों के अनुसार सरकारी निर्माण कार्यों में आवश्यक सामग्री परीक्षण, तकनीकी सुपरविजन और समयबद्ध रिपोर्टिंग यहां लगभग लापता है, जो इसे लापरवाही नहीं, बल्कि योजनाबद्ध अनदेखी की ओर संकेत देता है।

स्थानीय लोगों व विशेषज्ञों की राय साफ है—यदि कलेक्ट्रेट की दहलीज पर यह स्थिति है, तो दूरस्थ क्षेत्रों में जारी निर्माण कार्यों की हकीकत की कल्पना मात्र ही चिंताजनक है। यह परिदृश्य विकास की प्राथमिकता पर सवाल उठाता है और “अंधेर नगरी, चौपट राजा” की कहावत को सटीक वर्तमान संदर्भ देता है।
कौन है जिम्मेदार? किसके संरक्षण में लहराती है ढिलाई?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि परियोजना का एस्टीमेट किसने तैयार किया, किस स्तर पर और किन तकनीकी आधारों पर उसे पास किया गया?
अब तक की गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट कहाँ जमा है?
निगरानी किस अधिकारी की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी है और मौके पर नियमित उपस्थिति क्यों दर्ज नहीं?
यदि निर्माण डीएम कार्यालय की चौखट पर बिना रोकटोक घटिया प्रतीत हो रहा है, तो क्या यह सिर्फ अनजान बने रहने की कहानी है या संरक्षण की परतें कहीं गहरी हैं?

अभी तक न तो उच्चस्तरीय जांच का कोई संकेत, न आपत्तियों का उल्लेख, और न ही जवाबदेही तय करने की पहल—यह शांति ज़्यादा शोर करती है। जनता का प्रश्न सरल है—क्या जिलाधिकारी कार्यालय के सामने भ्रष्टाचार की संभावित बू अनदेखी की जा सकती है, या यह मौन सब कुछ कह रहा है?

जाँच की मांग — जनता के पाँच करोड़ की सुरक्षा का सवाल
विशेषज्ञों का मत स्पष्ट है—यह मामला सिर्फ ईंट-पत्थरों की गुणवत्ता का नहीं, बल्कि जनता की गाढ़ी कमाई के संभावित दुरुपयोग का मुद्दा है। ऐसे में निष्पक्ष, स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जांच अपरिहार्य है।
मुख्य बिंदु जिन पर जांच आवश्यक:
निर्माण कार्य का एस्टीमेट तैयार करने की प्रक्रिया और स्वीकृति की आधारशिला
प्रयुक्त सामग्री की तकनीकी व प्रयोगशाला जांच की रिपोर्ट
निगरानी करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारियाँ व अनुपस्थिति
कार्यदायी संस्था का विवरण और जवाबदेही निर्धारण
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते जांच और कार्रवाई नहीं की गई, तो यह बुद्धा पार्क विकास का प्रतीक नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का स्थायी स्मारक बनकर खड़ा होगा—जो आने वाली पीढ़ियों को व्यवस्था की विफलता का मौन संदेश देता रहेगा।

जिम्मेदारों की प्रतिक्रिया — सवालों से ज़्यादा दावों पर जोर
निर्माण कार्य की देखरेख करने वाले जेई वेदांत भट्ट का कहना है—
“मैं हमेशा मौके पर रहता हूँ, निर्माण पूरी तरह मानकों के अनुरूप है। डीएम कार्यालय के सामने निर्माण हो रहा है, ऐसे में गड़बड़ी की कोई गुंजाइश नहीं। डीएम साहब लगातार निरीक्षण करते हैं।”
हालाँकि मौके की स्थिति और दावों के बीच की दूरी अभी भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
अंतिम सवाल
क्या जिले की सबसे संवेदनशील चौखट पर उठते सवाल यूँ ही हवा में तैरते रहेंगे, या प्रशासन पारदर्शिता का मानक स्थापित कर उदाहरण पेश करेगा?
जनता जवाब चाहती है—और जवाबदेही भी।

