
विलेज फास्ट टाइम्स | कुशीनगर | विशेष संवाददाता की रिपोर्ट
कुशीनगर में चल रही यूपी बोर्ड परीक्षा के बीच महर्षि वाल्मीकि उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पिपरैचा एक बार फिर सुर्खियों में है। यहां कथित नकल प्रकरण ने न सिर्फ परीक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका को भी कटघरे में ला खड़ा किया है। आरोप इतने गंभीर हैं कि यदि निष्पक्ष जांच हो जाए तो कई चेहरे बेनकाब हो सकते हैं, लेकिन फिलहाल मामला महज ‘नोटिस’ की औपचारिकता में सिमटता नजर आ रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, बोर्ड के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद केन्द्र पर मिश्रित सीटिंग व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया गया। नियम यह है कि अलग-अलग विद्यालयों के परीक्षार्थियों को एक साथ बैठाया जाए, ताकि किसी एक संस्थान को सामूहिक लाभ न मिल सके। लेकिन यहां अपने ही विद्यालय के छात्रों को अलग-अलग कक्षों में बैठाने का आरोप है। यह सीधे-सीधे परीक्षा नियमावली की अवहेलना है।

मामले को और गंभीर बनाता है वाइस रिकॉर्डिंग सिस्टम का निष्प्रभावी होना। जिन कक्षों में निगरानी के लिए रिकॉर्डिंग अनिवार्य थी, वहां या तो व्यवस्था ठप रही या जानबूझकर कमजोर कर दी गई। ऐसे में परीक्षा की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
इमला बोलकर नकल कराने का आरोप
प्रकरण तब और तूल पकड़ गया जब बाह्य केन्द्र व्यवस्थापक विजय यादव और स्टेटिक मजिस्ट्रेट अमित कुमार द्वारा संयुक्त रूप से श्रवण कुमार गुप्त (डीआईओएस) को भेजे गए पत्र में यह उल्लेख किया गया कि वाइस रिकॉर्डिंग के अभाव का लाभ उठाकर कुछ कक्षों में इमला बोलकर उत्तर लिखवाए गए। यदि यह आरोप सही है तो यह न सिर्फ परीक्षा की पवित्रता पर आघात है, बल्कि उन छात्रों के साथ भी अन्याय है जो ईमानदारी से परीक्षा दे रहे हैं।
कार्रवाई या महज औपचारिकता?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद केन्द्र को डिबार क्यों नहीं किया गया? शिक्षा विभाग की ओर से केन्द्र व्यवस्थापक को नोटिस जारी कर मामले की ‘कोरमपूर्ति’ कर दी गई। जानकारों का कहना है कि यदि अनियमितताओं की पुष्टि हुई थी तो तत्काल प्रभाव से केन्द्र निरस्त कर कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए थी।
चौंकाने वाला पहलू यह भी है कि शिकायत को उजागर करने वाले बाह्य केन्द्र व्यवस्थापक विजय यादव को यह कहते हुए हटा दिया गया कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है। सवाल उठता है—यदि स्वास्थ्य ठीक नहीं था तो उन्हें इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी ही क्यों गई? और यदि उन्होंने अनियमितताओं की जानकारी दी, तो उसके तुरंत बाद ही उन्हें ड्यूटी से मुक्त क्यों कर दिया गया?
डीआईओएस की भूमिका पर उठते सवाल
अब निगाहें जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय पर टिक गई हैं। क्या मिश्रित सीटिंग तोड़ना महज एक ‘तकनीकी त्रुटि’ थी? वाइस रिकॉर्डिंग ठप होने की जिम्मेदारी किसकी तय होगी? क्या शिकायतकर्ता को हटाना दबाव की रणनीति थी या महज संयोग?
शिक्षा जगत में यह चर्चा तेज है कि यदि पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करनी है तो केवल नोटिस से काम नहीं चलेगा। जरूरत है निष्पक्ष जांच, जवाबदेही तय करने और दोषियों पर कठोर कार्रवाई की। अन्यथा ‘नकल मुक्त परीक्षा’ का दावा कागजी साबित होगा।
अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले में ठोस कदम उठाता है या फिर यह प्रकरण भी फाइलों में दबकर रह जाएगा। फिलहाल, सवाल सुरसा की तरह मुंह बाए खड़े हैं—और जवाब सिर्फ जिम्मेदार अधिकारियों को देना है।
