
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर | विशेष संवाददाता की रिपोर्ट
कुशीनगर। जनता की शिकायतों के त्वरित निस्तारण का दावा करने वाला ‘सम्पूर्ण समाधान दिवस’ इस बार खुद सवालों के घेरे में आ गया। पडरौना तहसील में आयोजित कार्यक्रम से सामने आई एक तस्वीर ने प्रशासनिक संवेदनशीलता पर तीखा प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। तस्वीर में फरियादी हाथ में प्रार्थना पत्र लिए खड़ा है, जबकि जिम्मेदार अधिकारी मोबाइल स्क्रीन में इस कदर मशगूल दिखे मानो जनसुनवाई नहीं, डिजिटल व्यस्तता का अभ्यास चल रहा हो।
हर शनिवार को आयोजित होने वाला यह मंच आमजन की उम्मीदों का केंद्र माना जाता है, जहाँ जमीन विवाद, कब्जा, पुलिस कार्रवाई, पेंशन, राजस्व और प्रमाणपत्र जैसी गंभीर समस्याओं पर सुनवाई होनी चाहिए। लेकिन मौके पर दिखा दृश्य कुछ और ही कहानी बयां करता है। फरियादी की व्यथा से ज्यादा नोटिफिकेशन की घंटी महत्वपूर्ण दिखी। सवाल उठता है—क्या जनसुनवाई अब औपचारिकता बनकर रह गई है?
ग्रामीण अंचलों से आए कई लोगों ने बताया कि घंटों इंतजार के बाद भी उनकी बात पूरी तरह सुनी नहीं गई। कुछ को आश्वासन की घिसी-पिटी पंक्तियों में उलझाकर टाल दिया गया, तो कुछ को अगले समाधान दिवस का रास्ता दिखा दिया गया। ऐसे में यह तस्वीर व्यवस्था और जनता के बीच बढ़ती दूरी का प्रतीक बन गई है।
उपस्थित अधिकारियों की भूमिका पर भी चर्चा तेज है। जनसरोकार के इस महत्वपूर्ण मंच पर यदि फरियादी की मौजूदगी के बावजूद ध्यान मोबाइल पर केंद्रित रहे, तो यह न केवल प्रशासनिक गरिमा पर आघात है बल्कि भरोसे की बुनियाद को भी कमजोर करता है।
समाधान दिवस का उद्देश्य समस्याओं का समाधान है, न कि संवेदनहीनता का प्रदर्शन। अब देखना यह है कि संबंधित अधिकारी इस तस्वीर को ‘क्षणिक दृश्य’ बताकर पल्ला झाड़ते हैं या आत्ममंथन कर व्यवस्था में सुधार का संदेश देते हैं। जनता जवाब चाहती है—क्योंकि सवाल सिर्फ एक तस्वीर का नहीं, भरोसे के तंत्र का है।
