
आदेश दोनों पर, कार्रवाई एक पर — सवालों में डीआईओएस की ‘चयनात्मक सख्ती’
निलंबन और मुकदमा :कुशीनगर में 700 छात्रों के भविष्य पर बडा सवाल
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर
विशेष संवाददाता की रिपोर्ट
कुशीनगर। पडरौना स्थित गोस्वामी तुलसीदास इंटर कॉलेज में 700 पत्राचार परीक्षार्थियों को परीक्षा से वंचित किए जाने का मामला अब प्रशासनिक गलियारों में तीखी बहस और जनचर्चा का विषय बन गया है। निदेशालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद कार्रवाई की दिशा और गति पर उठते सवालों ने पूरे प्रकरण को नया मोड़ दे दिया है। आरोप है कि आदेश “दोनों” के खिलाफ था, लेकिन कार्रवाई “एक” पर सिमट गई — और यही चयनात्मक सख्ती अब जांच के घेरे में है।
पत्राचार शिक्षा संस्थान, प्रयागराज से जारी आदेश में नोडल अधिकारी विकास मणि त्रिपाठी तथा प्रधान लिपिक ज्ञान प्रकाश पाठक, दोनों के विरुद्ध उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) अधिनियम-2024 की सुसंगत धाराओं में अभियोग पंजीकृत कराने का निर्देश था। किंतु जिला विद्यालय निरीक्षक श्रवण कुमार गुप्त के स्तर से केवल प्रधान लिपिक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर निलंबन की संस्तुति किए जाने की सूचना है। नोडल अधिकारी पर ठोस कदम अब तक लंबित हैं। सवाल उठता है — जब आदेश दो नामों पर था, तो कार्रवाई एक तक सीमित क्यों?

प्रक्रिया पर उठे गंभीर प्रश्न
विभागीय सूत्रों के अनुसार परीक्षा आवेदन पत्रों का अंतिम परीक्षण और बोर्ड को प्रेषण डीआईओएस कार्यालय के माध्यम से होता है। ऐसे में 700 फॉर्म अपूर्ण या त्रुटिपूर्ण पाए जाने की स्थिति में डीआईओएस दफ्तर की भूमिका स्वतः जांच के दायरे में आती है। क्या फॉर्म की गहन जांच हुई? यदि हुई तो खामियां पकड़ में क्यों नहीं आईं? और यदि नहीं हुई तो यह चूक किस स्तर की मानी जाए? विशेषज्ञ इसे बहु-स्तरीय निगरानी तंत्र की विफलता का संकेत मान रहे हैं।

निलंबन की प्रक्रिया पर कानूनी बहस
विधि विशेषज्ञों ने बिना कारण बताओ नोटिस निलंबन की संस्तुति पर आपत्ति जताई है। सेवा नियमावली के तहत सामान्यतः स्पष्टीकरण और सुनवाई का अवसर अपेक्षित होता है, विशेषकर जब मामला जांचाधीन हो। जानकारों का मानना है कि यदि प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, तो न्यायालय से राहत की संभावना बन सकती है।

‘जवाबदेही बनाम बचाव’ की चर्चा तेज
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि इस पूरे घटनाक्रम में वास्तविक जवाबदेही तय करने के बजाय कार्रवाई का फोकस सीमित रखा गया। अभिभावकों और परीक्षार्थियों में आक्रोश है। उनका कहना है कि प्रशासनिक निर्णयों की कीमत छात्रों के भविष्य से नहीं चुकाई जानी चाहिए।
फिलहाल, प्रकरण ने डीआईओएस कार्यालय की कार्यप्रणाली, जांच की पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़े प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। अब निगाहें इस पर हैं कि उच्चाधिकारियों के निर्देशों का सम्यक अनुपालन कब और कैसे सुनिश्चित होगा — और क्या चयनात्मक सख्ती की यह कहानी निष्पक्ष जांच की कसौटी पर खरी उतर पाएगी।
