
विलेज फास्ट टाइम्स, कुशीनगर | विशेष संवाददाता
अनुक्रमांक फ्रीज कांड में कानून का शिकंजा, छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ पर विभाग सख्त
कुशीनगर। यूपी बोर्ड परीक्षा 2026 से जुड़े 700 इंटरमीडिएट परीक्षार्थियों के आवेदन निरस्त किए जाने और अनुक्रमांक फ्रीज व विलोपित होने का मामला अब प्रशासनिक गलियारों में तूफान बन चुका है। शासन ने इस गंभीर प्रकरण को अत्यंत संवेदनशील मानते हुए कड़ा रुख अपनाया है। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद के निर्देश पर पत्राचार पंजीकरण केंद्र संख्या 901, गोस्वामी तुलसीदास इंटर कॉलेज, पडरौना से संबंधित अनियमितताओं के आरोपों के बीच विद्यालय के नोडल अधिकारी और प्रधान लिपिक के विरुद्ध आपराधिक अभियोग दर्ज कराने के आदेश जारी कर दिए गए हैं।
पत्राचार शिक्षा संस्थान, उत्तर प्रदेश, प्रयागराज के अपर शिक्षा निदेशक (पत्राचार) सी.एल. चौरसिया द्वारा जिला विद्यालय निरीक्षक, कुशीनगर श्रवण कुमार गुप्त को भेजे गए आधिकारिक पत्र में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि प्रकरण में उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) अधिनियम-2024 की सुसंगत धाराओं के अंतर्गत विधिक कार्रवाई सुनिश्चित कराई जाए। आदेश के बाद शिक्षा विभाग में हलचल तेज है और जिम्मेदारों के बीच जवाबदेही का दबाव बढ़ गया है।

इन पर दर्ज होगा मुकदमा
अपर शिक्षा निदेशक (पत्राचार) के निर्देशों के अनुसार, पंडित दीन दयाल उपाध्याय राजकीय इंटर कॉलेज, बिन्दवलिया एवं गोस्वामी तुलसीदास इंटर कॉलेज, पडरौना से जुड़े नोडल अधिकारी विकास मणि त्रिपाठी तथा प्रधान लिपिक ज्ञान प्रकाश पाठक के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई के साथ-साथ आपराधिक अभियोग दर्ज कराने की प्रक्रिया प्रारंभ करने को कहा गया है। पत्र में यह भी उल्लेख है कि यदि मामला अधिनियम-2024 की धारा 2(च) एवं धारा 14 के अंतर्गत परिलक्षित होता है, तो उन्हीं धाराओं में विधिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
सूत्रों के अनुसार, विभागीय स्तर पर साक्ष्यों का संकलन और दस्तावेजों की जांच तेज कर दी गई है, ताकि प्रकरण की निष्पक्षता पर कोई प्रश्नचिह्न न लगे। शिक्षा तंत्र में यह संदेश साफ तौर पर देखा जा रहा है कि लापरवाही या अनियमितता पर अब “शून्य सहनशीलता” की नीति लागू की जा रही है।
700 आवेदन निरस्त, अनुक्रमांक फ्रीज — जिम्मेदार कौन?
इस पूरे प्रकरण का सबसे पीड़ादायक पहलू वे 700 छात्र हैं, जिनकी सालभर की मेहनत एक प्रशासनिक फैसले की भेंट चढ़ती दिख रही है। छात्रों और अभिभावकों में आक्रोश है। सवाल उठ रहे हैं—
क्या यह तकनीकी त्रुटि थी?
क्या यह प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम है?
या फिर कहीं कोई सुनियोजित चूक या षड्यंत्र?
कई अभिभावकों का कहना है कि परीक्षा से ठीक पहले आवेदन निरस्त होने की सूचना ने बच्चों को मानसिक तनाव में डाल दिया है। “हमारे बच्चों का पूरा साल दांव पर लग गया,” एक अभिभावक ने नाराजगी जताते हुए कहा। सोशल मीडिया और स्थानीय मंचों पर भी इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।

अब क्या होगा?
डीआईओएस श्रवण कुमार गुप्त ने आदेश के अनुपालन में त्वरित कार्रवाई के संकेत दिए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि संबंधित प्रकरण में स्थानीय थाने पर अभियोग पंजीकृत कराने, साक्ष्यों के संकलन और शासन को विस्तृत रिपोर्ट भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
डीआईओएस ने यह भी बताया कि विद्यालय प्रबंधन को पत्र जारी कर प्रधान लिपिक के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कराने के निर्देश दिए गए हैं, जबकि राजकीय विद्यालय के प्रधानाचार्य एवं नोडल अधिकारी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई हेतु उच्चाधिकारियों को संस्तुति भेजी गई है।
यदि जांच में आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह मामला केवल विभागीय दायरे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दंडात्मक कार्रवाई का भी मार्ग प्रशस्त करेगा। शिक्षा विभाग की साख और छात्रों के भविष्य के प्रति जिम्मेदारी को देखते हुए शासन की सख्ती को एक निर्णायक कदम माना जा रहा है।
विश्वसनीयता की कसौटी पर शिक्षा व्यवस्था
यह प्रकरण शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि परीक्षा और पंजीकरण जैसी संवेदनशील प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और तकनीकी दक्षता सर्वोपरि होनी चाहिए।
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या दोषियों पर वास्तव में कड़ी कार्रवाई होगी, या फिर जिम्मेदारी की फाइलें ही “फ्रीज” होकर रह जाएंगी।
एक बात स्पष्ट है—700 छात्रों का भविष्य किसी भी स्तर की लापरवाही की कीमत नहीं बन सकता। शासन की सख्ती ने संदेश दे दिया है: शिक्षा के साथ खिलवाड़ अब बर्दाश्त नहीं।
