
कुशीनगर। “पडरौना बोल रहा है…” — ये आवाज़ आज हर राहगीर, दुकानदार और वाहन चालक की ज़ुबान पर है। शहर का मुख्य बाजार, बाईपास, गांधी चौक, पुराना बस स्टेशन हो या स्टेशन रोड — हर जगह जाम का झाम आम बात बन चुका है। ट्रैफिक व्यवस्था नाम की चीज़ जैसे गायब हो गई हो। घंटों तक वाहनों की कतारें और पैदल चलने वालों का दम घुटता माहौल अब रोजमर्रा का दृश्य है।
त्योहारों के सीजन में हालात और बिगड़ गए हैं। दीपावली की खरीददारी के चलते सड़कों पर रौनक तो है, पर यह रौनक जाम की तपिश में झुलस रही है। वाहन रेंग रहे हैं, हॉर्न का शोर कान फाड़ रहा है, और लोग परेशान होकर कह रहे हैं — “पडरौना अब शहर नहीं, जामनगर बन गया है!”
शहरवासी कहते हैं कि ट्रैफिक पुलिस का नियंत्रण बस नाम का है। कहीं वाहन गलत दिशा में खड़े हैं, तो कहीं ठेले-फेरी वालों ने आधी सड़क घेर रखी है। जिम्मेदार अधिकारी या तो बैठकों में व्यस्त हैं या आश्वासन देने में। कई बार सोशल मीडिया पर शिकायतें की गईं, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात।
वहीं, स्थानीय जनप्रतिनिधियों की प्रतिक्रिया भी लोगों को खल रही है। जब उनसे पूछा गया कि जाम की समस्या कब सुलझेगी, तो जवाब में बस एक हल्की मुस्कान और “देखा जाएगा” का जवाब मिला। जनता कहती है — “हम जाम में फंसे हैं, और माननीय मुस्कुरा रहे हैं!”
स्थानीय दुकानदारों का कहना है कि ग्राहक जाम देखकर लौट जाते हैं, जिससे व्यापार पर भी असर पड़ रहा है। कई बार तो एम्बुलेंस तक ट्रैफिक में फंस जाती है।
अब सवाल यही है कि क्या पडरौना की सड़कों को जाम से मुक्ति मिलेगी, या फिर शहर की पहचान “जाम में जकड़ा पडरौना” बन जाएगी? जनता इंतजार में है — किसी ठोस कदम की, किसी संवेदनशील सुनवाई की, ताकि “पडरौना बोले” तो आवाज़ बदलाव की गूंज बने, बेबसी की नहीं।
