
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर | विशेष संवाददाता
कुशीनगर। पडरौना के गोस्वामी तुलसीदास इंटर कॉलेज से जुड़े करीब 700 इंटरमीडिएट छात्रों का एक शैक्षणिक वर्ष संकट में पड़ गया है। परीक्षा फार्म, शुल्क जमा और हस्ताक्षर संबंधी कथित अनियमितताओं ने जिले की शिक्षा व्यवस्था को कठघरे में ला खड़ा किया है। अभिभावकों और छात्रों के बीच आक्रोश है, जबकि जिम्मेदार कार्यालयों की भूमिका पर तीखे सवाल उठ रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार, कॉलेज में नियमित प्रधानाचार्य की तैनाती के बावजूद नोडल अधिकारी की नियुक्ति की गई। नियमों के तहत बोर्ड परीक्षा फार्म पर नोडल अधिकारी के हस्ताक्षर अनिवार्य बताए जाते हैं, लेकिन आरोप है कि कुछ फार्मों पर हस्ताक्षर की प्रक्रिया में नियम-विरुद्ध तरीके अपनाए गए। यह भी दावा किया जा रहा है कि छात्रों से शुल्क वसूली के बाद समय पर बोर्ड खाते में जमा नहीं किया गया, जिससे तकनीकी अड़चनें बढ़ीं।
मामले के केंद्र में प्रधान लिपिक ज्ञान प्रकाश पाठक, नोडल अधिकारी विकास मणि और डीआईओएस श्रवण गुप्ता की कार्यप्रणाली चर्चा में है। सवाल यह कि जब संस्थान में प्रशासनिक ढांचा मौजूद था, तो अतिरिक्त व्यवस्थाओं की जरूरत क्यों पड़ी? और यदि पड़ी, तो जिम्मेदारियों की स्पष्ट रेखा क्यों नहीं खींची गई? शिक्षा जगत के जानकार इसे “प्रक्रियात्मक चूक” से अधिक “प्रबंधन की विफलता” मान रहे हैं।

जांच व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न
बोर्ड को फार्म प्रेषित करने से पूर्व डीआईओएस कार्यालय में सत्यापन की प्रक्रिया होती है। यदि यह जांच समयबद्ध और प्रभावी होती, तो हस्ताक्षर अथवा शुल्क संबंधी त्रुटियां प्रारंभिक स्तर पर पकड़ी जा सकती थीं। अभिभावकों का कहना है कि “यदि निगरानी मजबूत होती, तो 700 छात्रों का साल दांव पर न लगता।”
प्रशासनिक प्रतिक्रिया की मांग तेज
छात्र संगठनों और स्थानीय नागरिकों ने निष्पक्ष जांच, जवाबदेही तय करने और प्रभावित छात्रों के हित में त्वरित समाधान की मांग की है। कई अभिभावकों ने यह भी पूछा है कि “क्या किसी स्तर पर जिम्मेदारी स्वीकार की जाएगी, या फिर फाइलों में ही भविष्य उलझा रहेगा?”
जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर कटाक्ष
इतने बड़े पैमाने पर छात्रों का शैक्षणिक नुकसान केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं, सामाजिक चिंता का विषय भी है। इसके बावजूद जनप्रतिनिधियों की अपेक्षित मुखरता नजर नहीं आई। छात्र-हितों की आवाज कौन उठाएगा—यह प्रश्न अब सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन चुका है।
फिलहाल, सभी निगाहें जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह प्रकरण जिले की शिक्षा व्यवस्था के लिए एक कड़वा उदाहरण बन सकता है—जहां प्रक्रियाओं की धुंध में विद्यार्थियों के सपने धूमिल होते दिख रहे हैं।
