
वर्ष 2008 से फर्जी चयन वेतनमान लेकर लाखों रुपये की सरकारी लूट का सनसनीखेज खुलासा हुआ है। कप्तानगंज स्थित गंगा बक्श कनोडिया इंटर कॉलेज के सहायक अध्यापकों की कथित कारस्तानी ने शिक्षा विभाग में हड़कंप मचा दिया।
कुशीनगर।
जनपद के कप्तानगंज स्थित गंगा बक्श कनोडिया इंटरमीडिएट कॉलेज एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में है। यहां तैनात सहायक अध्यापक श्याम नारायण पाण्डेय, वीरेंद्र पाण्डेय और बर्खास्तगी के बाद तथ्य छुपाकर नौकरी कर रहे देवेन्द्र पाण्डेय पर विनियमितकरण से पूर्व फर्जी तरीके से चयन वेतनमान का लाभ उठाकर सरकारी खजाने को लाखों रुपये की चपत लगाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। सूत्रों का दावा है कि इन शिक्षकों की कथित कारस्तानी सिर्फ एक-दो मामलों तक सीमित नहीं, बल्कि फर्जीवाड़े की पूरी श्रृंखला सामने आ रही है।
सूत्रों के अनुसार, जुलाई 2012 से जून 2014 तक यह तीनों शिक्षक विद्यालय में बिना कार्य किए अनुपस्थित रहे, बावजूद इसके एरियर के रूप में लाखों रुपये का भुगतान ले लिया गया। चौंकाने वाली बात यह है कि उक्त अवधि में इन शिक्षकों के हस्ताक्षर विद्यालय की मूल उपस्थिति पंजिका में दर्ज ही नहीं हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब दो वर्षों तक शिक्षण कार्य किया ही नहीं गया, तो वेतन और एरियर का भुगतान किस आधार पर हुआ? इस पूरे प्रकरण में तत्कालीन डीआईओएस कार्यालय की भूमिका भी संदेह के घेरे में बताई जा रही है।
मामला यहीं नहीं रुकता। सूत्रों का कहना है कि वर्ष 2018 में इन शिक्षकों ने तथ्य गोपन और कूटरचित दस्तावेजों के सहारे संयुक्त शिक्षा निदेशक, सप्तम मंडल, गोरखपुर से अपनी सेवाओं का विनियमितकरण करा लिया। जानकारों के मुताबिक, विनियमितकरण के लिए शिक्षक का सेवा कार्यकाल नियमित होना और प्रति माह वेतन आहरण आवश्यक शर्त है, जबकि इन तीनों शिक्षकों का न तो सेवा कार्यकाल नियमित था और न ही वे नियमित रूप से वेतन प्राप्त कर रहे थे। इसके बावजूद 23 अप्रैल 2018 को सेवाएं नियमित हो जाना कई सवाल खड़े करता है।
सबसे बड़ा और गंभीर प्रश्न चयन वेतनमान को लेकर है। सूत्र बताते हैं कि श्याम नारायण पाण्डेय, वीरेंद्र पाण्डेय और देवेन्द्र पाण्डेय ने वर्ष 2008 से चयन वेतनमान का लाभ प्राप्त करना शुरू कर दिया था, जबकि विभागीय नियमों के अनुसार बिना विनियमितकरण चयन वेतनमान मिल ही नहीं सकता। यदि इनका विनियमितकरण 2018 में हुआ, तो शासनादेश के अनुसार चयन वेतनमान का लाभ इन्हें 2028 से पहले मिलना संभव नहीं था। फिर 2008 से चयन वेतनमान कैसे दिया गया? जानकारों का कहना है कि यह सीधे-सीधे नियमों की धज्जियां उड़ाने और सरकारी धन की खुली लूट का मामला है।
सूत्रों के मुताबिक, चयन वेतनमान और एरियर के नाम पर अब तक लाखों रुपये सरकारी खजाने से निकल चुके हैं। वर्ष 2025 में बिना कार्य किए दो वर्षों का वेतन एरियर के रूप में भुगतान किया जाना इस फर्जीवाड़े की गंभीरता को और बढ़ाता है। विशेषज्ञों की मानें तो एक के बाद एक कूटरचित दस्तावेजों के सहारे लाभ लेना जघन्य अपराध की श्रेणी में आता है, जिसकी गहन जांच और रिकवरी जनहित में अनिवार्य है।
अब मामला पदोन्नति तक पहुंच गया है। सूत्र बताते हैं कि श्याम नारायण पाण्डेय और वीरेंद्र पाण्डेय ने एक बार फिर तथ्य गोपन कर पदोन्नति के लिए जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय में आवेदन किया है। इस पर डीआईओएस श्रवण कुमार गुप्त ने विद्यालय प्रबंधन और प्रधानाचार्य से पदोन्नति से संबंधित पत्रावली तलब की है। जानकारों का कहना है कि जब विनियमितकरण और चयन वेतनमान ही सवालों के घेरे में हैं, तो पदोन्नति की प्रक्रिया अपने आप में संदेहास्पद हो जाती है।
शिक्षा विभाग में चर्चा है कि यदि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद पदोन्नति होती है, तो यह महज प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि किसी बड़ी सांठगांठ की ओर इशारा करेगा। फिलहाल यह पूरा मामला जांच का विषय है, लेकिन जिस तरह से तथ्य, दस्तावेज और तिथियां सामने आ रही हैं, उससे साफ है कि यह सिर्फ एक विद्यालय का नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की जवाबदेही से जुड़ा गंभीर प्रकरण बन चुका है। अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इस कथित फर्जीवाड़े पर कब और क्या सख्त कार्रवाई करते हैं।
नोट — अगले अंक में बड़ा खुलासा तय है। दो वर्षों तक बिना विद्यालय आए, तथ्य छुपाकर फर्जी दस्तावेजों के सहारे लाखों का एरियर हड़पने की परतें खुलेंगी। मूल उपस्थिति पंजिका से जुड़े चौंकाने वाले प्रमाण सिस्टम की पोल खोलेंगे।

