


कुशीनगर। बोर्ड परीक्षा से ठीक पहले सामने आई एक सनसनीखेज प्रशासनिक गड़बड़ी ने शिक्षा तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 18 फरवरी से शुरू होने वाली माध्यमिक शिक्षा परिषद की परीक्षा के पहले ऐसा प्रकरण उजागर हुआ है, जिसने एक झटके में लगभग 700 परीक्षार्थियों के भविष्य पर अनिश्चितता का साया डाल दिया। सालभर की मेहनत, उम्मीदें और सपने—सब कुछ फाइलों की चूक और कथित लापरवाही के बीच उलझकर रह गए। अभिभावकों और छात्रों में रोष है, जबकि विभागीय दफ्तरों में हलचल तेज हो गई है।
मामला पडरौना नगर के रामकोला रोड स्थित गोस्वामी तुलसीदास इंटर कॉलेज से जुड़ा बताया जा रहा है। आरोप है कि विद्यालय के प्रधान लिपिक ज्ञान प्रकाश पाठक द्वारा नोडल अधिकारी के कथित फर्जी हस्ताक्षर किए गए, जिसके चलते परीक्षा संबंधी प्रक्रिया में गंभीर विसंगतियाँ पैदा हुईं। यदि प्रारंभिक जांच में सामने आए तथ्य सही साबित होते हैं, तो यह केवल विभागीय त्रुटि नहीं बल्कि आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आ सकता है। सूत्रों के अनुसार, पंजीकरण, शुल्क जमा, अर्हता सत्यापन और अनुसरण प्रमाणपत्रों की वैधता जैसे बुनियादी बिंदुओं पर समय रहते निगरानी नहीं की गई, और अंतिम तिथि बीतने के बाद खामियाँ उजागर हुईं।
परिणामस्वरूप, सैकड़ों छात्रों के आवेदन निरस्त होने की खबर ने पूरे जिले में चिंता की लहर दौड़ा दी। जिन विद्यार्थियों ने वर्षभर परीक्षा की तैयारी की, वे अब असमंजस और मानसिक दबाव से गुजर रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि यदि पंजीकरण अथवा शुल्क में कोई कमी थी, तो तत्काल आपत्ति क्यों नहीं दर्ज की गई? अनुसरण प्रमाणपत्रों की वैधता की जांच पहले क्यों नहीं की गई? अंतिम तिथि तक अपात्र फॉर्म स्वीकार कैसे होते रहे? ये प्रश्न अब शिक्षा विभाग की जवाबदेही के केंद्र में हैं।
विभागीय सूत्र बताते हैं कि मामले की गंभीरता को देखते हुए माध्यमिक शिक्षा परिषद, उत्तर प्रदेश के सचिव भगवती सिंह ने संयुक्त शिक्षा निदेशक, गोरखपुर मंडल सतीश सिंह को तत्काल जांच के निर्देश दिए हैं। जांच टीम गठित कर रिपोर्ट तलब की गई है, और दोष सिद्ध होने पर कठोर कार्रवाई का संकेत दिया गया है। हालांकि, जनमानस में यह आशंका भी तैर रही है कि क्या इस बार सच पूरी तरह सामने आएगा या मामला कागजी कार्रवाई में सिमट जाएगा।
फर्जी हस्ताक्षर का आरोप—कानूनी कसौटी पर बड़ा सवाल
प्रारंभिक जांच में यदि नोडल अधिकारी के हस्ताक्षर फर्जी पाए जाते हैं, तो यह गंभीर दंडनीय अपराध बन सकता है। विधिक प्रावधानों के तहत दोष सिद्ध होने पर कारावास और जुर्माने की सख्त सजा संभव है। लेकिन इससे भी बड़ा मुद्दा यह है कि इतनी बड़ी अनियमितता बिना विभागीय स्तर पर सतर्कता के कैसे होती रही? क्या निगरानी तंत्र निष्क्रिय रहा या कहीं न कहीं समन्वय की कमी उजागर हुई?
डीआईओएस कार्यालय पर उठते सवाल
जानकारों का कहना है कि परीक्षा जैसे संवेदनशील विषय में जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) कार्यालय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि प्रक्रिया में खामियाँ थीं, तो समय रहते सुधारात्मक कदम क्यों नहीं उठाए गए? चर्चा-ए-सरेआम है कि समस्या केवल एक कर्मचारी तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी कार्यप्रणाली की पारदर्शिता और जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
छात्रों और अभिभावकों में आक्रोश
अभिभावकों का कहना है—“यदि गलती संस्थागत है, तो सजा छात्रों को क्यों?” उनका तर्क है कि बच्चों ने न नियम तोड़े, न कोई त्रुटि की, फिर भी उनका एक वर्ष दांव पर लग गया। छात्रों की मांग है कि विभाग तत्काल समाधान निकाले, ताकि मेहनत पर पानी न फिरे।
अब निगाहें जांच रिपोर्ट और विभागीय कार्रवाई पर टिकी हैं। यह प्रकरण शिक्षा तंत्र के लिए चेतावनी भी है और परीक्षा की पवित्रता की कसौटी भी—जहां एक चूक सैकड़ों सपनों को हिला सकती है।
