

विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से बड़ी खबर…
जनपद कुशीनगर के छितौनी क्षेत्र से किसानों की बदहाली की एक और दर्दनाक तस्वीर सामने आई है, जिसने प्रशासनिक दावों की पोल खोलकर रख दी है। सह गन्ना विकास समिति छितौनी के अध्यक्ष निर्मिला सिंह द्वारा जिलाधिकारी को भेजा गया पत्र व्यवस्था पर करारा प्रहार है। पत्र में स्पष्ट किया गया है कि छितौनी क्षेत्र के चार प्रमुख गन्ना क्रय केंद्र—छितौनी नंबर-2, गोविंदपुर, बेलवाटिया और जामुनहापुर—पर इस पेराई सत्र में हालात बेहद चिंताजनक बने हुए हैं।
मिल संचालन शुरू हुए कई सप्ताह बीत चुके हैं, लेकिन इन केंद्रों से गन्ना उठान लगभग ठप पड़ा है। 27, 28, 29 और 30 दिसंबर को किसानों को घंटों इंतजार कराया गया, बावजूद इसके उनका गन्ना नहीं उठाया गया। न तो पर्ची का पालन हुआ और न ही निर्धारित समय पर उठान। नतीजा यह है कि किसान खेतों में खड़े गन्ने के साथ बेबस खड़ा है, जबकि मिल प्रबंधन कुंभकर्णी नींद में सोया हुआ प्रतीत हो रहा है।
सबसे गंभीर स्थिति भुगतान को लेकर है। शासन द्वारा तय 14 दिन की समय-सीमा के बावजूद यहां 13 दिसंबर 2025 तक का भुगतान भी लंबित है। किसान कर्ज, खाद, बीज और पारिवारिक जरूरतों के बोझ तले दबा है, लेकिन उसे उसका हक तक नहीं मिल रहा। इस लापरवाही से किसानों में भारी आक्रोश पनप रहा है, जो किसी भी वक्त आंदोलन का रूप ले सकता है।
इसी आक्रोश के बीच बड़ी संख्या में किसान जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचे और पत्र के माध्यम से अपनी पीड़ा रखी। इस दौरान विजय कुमार (अध्यक्ष प्रतिनिधि), विकास कुशवाहा, राज मंगल कुशवाहा, नंदलाल कुशवाहा, सिरी कुशवाहा, अब्दुल गफ्फार, वीरेंद्र यादव, शंभू गुप्ता, इंद्रजीत कुशवाहा, राजाराम, राहुल, विपिन कुशवाहा, मुरलीधर, अध्याय कुमार, गुड्डू, जंगली, राजकुमार कुशवाहा, श्री कृष्णा कुशवाहा, चंदेश्वर सिंह, विजय सेन, अवधेश कुमार, राजकुमार यादव, सुभाष कुशवाहा, दिनेश कुशवाहा, बृज किशोर राजवंशी, कपिल देव, बांकेलाल, ध्रुव नारायण, शिवकुमार गुप्ता, सुरेश कुशवाहा, बृजेश कुमार, अजय कुमार, धर्मेंद्र कुशवाहा, उमेश कुशवाहा, मिठू चौधरी, केदारनाथ गुप्त और तिमाल विश्वकर्मा सहित अनेक किसान मौजूद रहे।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—जब सरकार किसान हित की बात करती है, तो ज़मीनी हकीकत इतनी बेरहम क्यों है? क्या मिल मालिकों पर किसी का अंकुश नहीं? क्या प्रशासन केवल कागज़ी आदेशों तक सीमित रह गया है? यदि समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो किसानों की यह नाराज़गी सड़कों पर उतर सकती है—और इसकी पूरी जिम्मेदारी व्यवस्था की होगी।

