

विलेज फास्ट टाइम्स न्यूज नेटवर्क | उत्तर प्रदेश | लखनऊ
प्रयागराज सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी ने एक बार फिर प्रशासनिक मशीनरी को सक्रिय कर दिया है। शीर्ष अदालत ने अपने महत्वपूर्ण फैसलों में दोहराया है कि सार्वजनिक उपयोग की सरकारी भूमि—जैसे तालाब, सड़क, पार्क और चारागाह—पर किए गए अवैध कब्जे किसी भी परिस्थिति में नियमित (Regularize) नहीं किए जा सकते, चाहे कब्जा कितना भी पुराना क्यों न हो।
अदालत ने Jagpal Singh बनाम State of Punjab (2011) के ऐतिहासिक निर्णय का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि सरकारी जमीन पर प्रतिकूल कब्जा (Adverse Possession) का सिद्धांत लागू नहीं होता। निजी भूमि पर भले 12 वर्षों में स्वामित्व का दावा संभव हो, लेकिन सरकारी भूमि पर यह नियम प्रभावी नहीं है। कोर्ट ने कहा कि सरकार को ऐसी जमीनों को कभी भी खाली कराने का अधिकार है, बशर्ते विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन किया जाए।
न्यायालय की इस कड़ी रुख के बाद उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में प्रशासन ने निगरानी और अतिक्रमण हटाओ अभियानों को तेज करने के संकेत दिए हैं। राजस्व एवं स्थानीय प्रशासन को निर्देशित किया गया है कि सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और अवैध कब्जों के विरुद्ध त्वरित, निष्पक्ष कार्रवाई की जाए।
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, “जहां वैध पट्टा/आवंटन मौजूद है, वहां कार्रवाई का प्रश्न नहीं उठता। लेकिन अनधिकृत कब्जे कानूनन हटाने योग्य हैं और इस दिशा में अभियान निरंतर जारी रहेगा।”
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह पुन: पुष्टि जमीनी स्तर पर जवाबदेही बढ़ाएगी और सार्वजनिक संसाधनों की रक्षा को मजबूती देगी। आम नागरिकों ने भी फैसले का स्वागत करते हुए उम्मीद जताई है कि तालाब, सड़क और चारागाह जैसी संपत्तियों को अतिक्रमण से मुक्त कराया जाएगा।
सरकारी भूमि पर कानून का यह स्पष्ट संदेश अब अमल की कसौटी पर है—जहां न्यायालय की सख्ती और प्रशासन की तत्परता, दोनों की परीक्षा होगी।
