





डूबते सूरज को अर्घ्य देकर व्रती माताओं ने मांगी संतान की दीर्घायु, आस्था से दमका कुशीनगर
छठ घाटों पर उमड़ा सैलाब: डूबते भगवान भास्कर को अर्घ्य, लोक-आस्था और गीतों से गूंजा नगर
छठी मईया के जयकारों संग व्रतियों ने दिया प्रथम अर्घ्य, संतान-सुख और समृद्धि की कामना
चार दिन का पर्व, अनंत आस्था का उत्सव — जल में खड़े होकर व्रती माताओं ने डूबते सूर्य की स्तुति की
लोकगीत, दीप, रोशनी और भक्ति से नहाए घाट — उगते सूर्य के अर्घ्य के साथ होगा व्रत का समापन
कुशीनगर। डूबते सूरज की सिंदूरी लाली, पोखरों में揺ती लौ, हाथों में अर्घ्य और आँखों में संकल्प—कुशीनगर की शाम आस्था के ऐसे विराट स्वरूप की साक्षी बनी, जिसने पूरे जिले के वातावरण को आध्यात्मिक उत्सव में बदल दिया। छठ महापर्व के तीसरे दिन व्रती माताएँ नई साड़ी, मांग में भरे सिंदूर और मटकी, डाला, सूप, फल और ठेकुआ से सजे प्रसाद के साथ घाटों पर पहुँचीं। जल में खड़े होकर जब उन्होंने भगवान भास्कर को प्रथम अर्घ्य अर्पित किया, तो हर डुबकी, हर मंत्र और हर समर्पण में संतान की दीर्घायु, परिवार की समृद्धि और सुख-शांति की कामनाएँ लहरों की तरह प्रवाहित होती रहीं।
जिले के सेवरही, हाटा, कप्तानगंज, खड्डा, कसया और पडरौना तक — हर घाट आज मानो एक साथ बोल उठा था: “छठ मईया की जय!” लोकगीतों की गूंज, महिलाओें की सामूहिक तपस्या और जल में थिरकती रोशनियों का दृश्य किसी लोक-आध्यात्मिक चलचित्र से कम न था। घाट पर खड़ी व्रती महिलाओं की थरथराती हथेलियाँ जब ढलते भगवान सूर्य तक पहुँचीं, तो उनके संग मानो पूरा वातावरण प्रार्थना की मुद्रा में झुक गया।
लोकमान्यता है—छठी मईया सबकी मनोकामनाएँ पूरी करती हैं। यही विश्वास ही तो है, जो 36 घंटे के निर्जला व्रत को तपस्या बना देता है। दिन भर ठेकुआ, कसार और प्रसाद बनाने में जुटी माताएँ शाम तक सिर्फ शरीर से नहीं, मन से भी तप कर एक अलग ही प्रभामंडल में प्रवेश कर जाती हैं। एक घर से दूसरे घर प्रसाद और सामग्री के आदान-प्रदान से गाँवों में रिश्तों की मिठास और सामूहिकता की खुशबू फैलती रही।
इस बार पडरौना नगर के सोराजी पोखरा पर दृश्य सबसे अद्वितीय रहा। अमृत सरोवर मिशन के तहत करवाए गए सुंदरीकरण और घाट निर्माण के कारण जब व्रती महिलाएँ पोखरे पर पहुँचीं, तो उनकी आँखें श्रद्धा के साथ गर्व से भी भर उठीं। स्वच्छ घाट, मनोहारी लाइटिंग, आकर्षक घाट सीढ़ियाँ और पानी में प्रतिबिंबित हजारों दीप — दृश्य ऐसा जैसे कोई जीवंत चित्रकला! महिलाएँ अपने भाव रोक न सकीं और सहज ही आशीर्वाद की आवाज़ें उठने लगीं—
“जुग-जुग जियें विनय बाबू…”
चेहरों पर कृतज्ञता, स्वर में आभार और भाव में अपनापन। यह सम्मान किसी राजनीतिक नारे की तरह नहीं, बल्कि सच्चे मन से निकले उस धन्यवाद की तरह था, जो एक संस्कृति को बचाने और आस्था का सम्मान करने वाले प्रयासों के प्रति जनता देती है।
उधर घाटों पर सुरक्षा की जिम्मेदारी भी पूरी तरह सक्रिय दिखी। प्रशासन और पुलिस की टीम लगातार गश्त पर रही। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के लिए अलग मार्ग, बैरिकेडिंग, रोशनी के पुख्ता इंतज़ाम और गोताखोरों की तैनाती — इससे श्रद्धालुओं में भरोसा और वातावरण में शांति बनी रही।
जैसे-जैसे सूर्य क्षितिज में विलीन हुआ, दीयों का सौंदर्य और गीतों का कंपन बढ़ता चला गया। हर दीप में एक कहानी थी, हर थाली में एक आस्था। लोकगीत “काशी हिले, पटना हिले…” से लेकर “हे छठी मईया…” तक — गीतों ने रात को भाव-भक्ति के संगीत में बदल दिया। गाँव-गाँव में कोसी भरने की रस्म ने माहौल को और पवित्र कर दिया—जहाँ माताएँ सात दियों की रोशनी में संतान-सुख की मन्नत माँगती रहीं।
आज की यह संध्या भव्य थी, लेकिन आने वाली सुबह और भी पावन होगी—क्योंकि छठ का असली पूर्णत्व उगते सूर्य के अर्घ्य में है। पूरी रात घाटों पर जागकर, भक्ति में लीन रहकर जब महिलाएँ कल सुबह जल में खड़े होकर भगवान भास्कर के प्रथम दर्शन करेंगी, तब उनके चेहरे पर उगते सूरज की किरणें नहीं, पूर्णता और विजय की चमक भी उतरती दिखेगी। अर्घ्य के बाद ‘पारण’ की रस्म के साथ 36 घंटे का कठोर तप, संयम और आत्मबल का व्रत पूरा होगा।
छठ सिर्फ पूजा नहीं, यह अनुशासन, सादगी, स्वच्छता, परिवार, मातृत्व, प्रकृति और संस्कृति—सबको एक सूत्र में बाँधने वाला त्योहार है।
आज कुशीनगर ने यही देखा… यही महसूस किया… और यही जिया।
“डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर आज व्रतियों ने प्रार्थना का दीप जलाया है… अब सारी नजरें उस सुनहरी सुबह पर टिकी हैं, जहाँ उगते सूर्य संग छठ मईया का आशीष धरती पर उतरेगा। आस्था की यह ज्योति यूँ ही प्रत्येक घर, प्रत्येक हृदय और प्रत्येक पीढ़ी को प्रकाश देती रहे — यही कामना, यही विश्वास और यही संस्कार… छठ महापर्व का अंतिम संदेश है।”
