

विलेज फास्ट टाइम्स ब्यूरो, कुशीनगर
कुशीनगर। कड़कड़ाती सर्द हवाओं के कहर ने जनजीवन की रफ्तार को जकड़कर धरातल पर ला दिया है। ठंड का ऐसा कहर कि बाजारों की चकाचौंध सिमटकर धुंध में खो गई है और कभी रौनक से भरी रहने वाली सड़कें अब सुनसान पड़ी हैं। सूरज की किरणें जैसे आसमान से रूठ गई हों, धुंध की चादर ने पूरे जिले को अपनी गिरफ्त में इस कदर कैद कर लिया है कि लोग घरों से बाहर निकलने की हिम्मत जुटा ही नहीं पा रहे।
बाजारों की रौनक पर सन्नाटा पसरा हुआ है। दुकानों के शटर तो खुले हैं, लेकिन खरीददारों की कमी से व्यापारी ठिठुरते हाथों को रगड़ते हुए ग्राहकों की प्रतीक्षा में पल-पल गिन रहे हैं। सुबह-सवेरे चाय की दुकानों पर लगने वाली भीड़ भी इस कडाके की ठंड में सिमट गई है। चाय की भट्ठियों से निकलती भाप और अलाव की मद्धम लपटें भी इस निर्दयी सर्दी के कहर को मानो सिर्फ छेड़ रही हैं, राहत का नामोनिशान नहीं।
सबसे अधिक मार गरीब, मज़दूर और बेघर तबके पर। जिनके सिर पर छत नहीं, जिनके तन पर मोटा कपड़ा नहीं, उनके लिए यह मौसम ठिठुरन नहीं, जीवन-मरण की क्रूर परीक्षा बन चुका है। खेत-खलिहानों में काम करने वाले श्रमिकों की हथेलियाँ मानो पत्थर हो गई हों, फिर भी पेट की आग बुझाने को वे रोज़ी की तलाश में धुंध को चीरते हुए बाहर निकलने को मजबूर हैं। अलाव की टिमटिमाती आग पर सिकुड़ते बदन, कांपते होंठ और लिपटे कंबलों में छिपती सांसें—यह सब इस सर्दी की बेरहम तस्वीर को बयां कर रही हैं।
ठंड के कहर से सिर्फ इंसान ही नहीं, पशु-पक्षी तक बेहाल। खेतों के किनारे, सड़कों के पास, पशुओं की सांस से उठती भाप और ठिठुरते पालतू जानवर जीवन की नाजुकता का अहसास करा रहे हैं। दूध देने वाले पशुओं का दूध उत्पादन गिरने लगा है और चरवाही करते ग्रामीण हर दिन इस चिंता में डूबे हैं कि अगर यह ठंड यूं ही दहाड़ती रही, तो पशुधन भी इसकी चपेट में मौत के मुंह तक जा सकता है।
सरकारी स्तर पर अलाव की व्यवस्था तो की जा रही है, पर जरूरत के मुकाबले नाकाफी। हालात इतने सर्द कि लोग दुआ कर रहे हैं—रहमत बनकर सूरज लौट आए और ठंड की यह बेकाबू क्रूरता कुछ नरम पड़े।
फिलहाल कुशीनगर में ठंड सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि सिहरन भरा इम्तिहान बन चुकी है, और हर कोई इस बर्फीले मौसम में राहत की एक किरण का इंतजार कर रहा है।
