
विलेज फास्ट टाइम्स | विशेष रिपोर्ट दुदही से मुन्ना अंसारी
उत्तर प्रदेश में ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की असली धुरी मानी जाने वाली आशा कार्यकर्ताओं की पीड़ा एक बार फिर सड़कों से लेकर सरकार के दरबार तक गूंजने लगी है। उत्तर प्रदेश आशा वर्कर्स यूनियन की ओर से सौंपा गया ताज़ा ज्ञापन न सिर्फ़ स्वास्थ्य विभाग के दावों पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि सिस्टम की संवेदनहीनता को भी बेनकाब करता है। यूनियन ने साफ शब्दों में कहा है कि जिस व्यवस्था को आशा कार्यकर्ता अपने कंधों पर ढो रही हैं, वही व्यवस्था आज उन्हें हाशिए पर धकेल रही है।
यूनियन के अनुसार, आशा कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर गर्भवती महिलाओं की देखभाल, नवजात शिशुओं की सुरक्षा, टीकाकरण, परिवार नियोजन, संक्रामक रोगों की पहचान और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं को धरातल पर उतारने का काम करती हैं। सरकार की हर महत्वाकांक्षी योजना की पहली कड़ी आशा कार्यकर्ता ही होती हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बावजूद उन्हें न तो नियमित कर्मचारी का दर्जा मिला और न ही सम्मानजनक वेतन।
ज्ञापन में यह भी आरोप लगाया गया है कि महंगाई आसमान छू रही है, लेकिन आशा कार्यकर्ताओं का मानदेय आज भी बेहद कम है। कई जिलों में महीनों तक भुगतान नहीं होता, जिससे आशा कार्यकर्ताओं को कर्ज़, तंगी और अपमान का सामना करना पड़ता है। कोरोना काल में जब पूरा सिस्टम चरमरा गया था, तब आशा कार्यकर्ताओं ने जान जोखिम में डालकर घर-घर जाकर सर्वे, दवा वितरण और जागरूकता का काम किया। लेकिन आज वही योद्धा बिना सुरक्षा, बिना बीमा और बिना सम्मान के काम करने को मजबूर हैं।
उत्तर प्रदेश आशा वर्कर्स यूनियन ने दो टूक शब्दों में मांग की है कि आशा कार्यकर्ताओं को तत्काल नियमित कर्मचारी का दर्जा दिया जाए, न्यूनतम मानदेय तय हो, भुगतान में हो रही देरी पर रोक लगे और सामाजिक सुरक्षा, पेंशन व स्वास्थ्य बीमा जैसी बुनियादी सुविधाएं दी जाएं। साथ ही, फील्ड में काम के दौरान सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराना भी अनिवार्य किया जाए। यूनियन का कहना है कि हर बार सिर्फ़ आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन फाइलों से बाहर कोई ठोस निर्णय आज तक नहीं उतरा।
ज्ञापन में यह भी उजागर किया गया है कि आशा कार्यकर्ताओं पर लगातार नए-नए काम थोपे जा रहे हैं। सर्वे, रिपोर्टिंग, डिजिटल एंट्री और अभियान—सब कुछ आशा के जिम्मे है, लेकिन उसके बदले भुगतान में कोई बढ़ोतरी नहीं की जा रही। इससे कार्यकर्ताओं में गहरा आक्रोश है और वे खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही हैं।
यूनियन ने सरकार को चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही उनकी मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो आशा कार्यकर्ता सड़क पर उतरकर आंदोलन करने को मजबूर होंगी, जिसकी पूरी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।
फिलहाल, इस पूरे मामले पर स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है। क्या सरकार वास्तव में आशा कार्यकर्ताओं को सम्मान देना चाहती है या फिर सिर्फ़ काग़ज़ी प्रशंसा तक ही सीमित रह जाएगी? आशा कार्यकर्ताओं का यह ज्ञापन अब सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है। देखना यह है कि शासन-प्रशासन कब जागता है और कब इन जमीनी योद्धाओं को उनका हक़ मिलता है।



