

विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता की रिपोर्ट
कुशीनगर। प्रशासनिक गलियारों में अक्सर “सब ठीक है” का राग सुनाई देता है, मगर जमीनी हकीकत कभी-कभी खुद ही प्रेस नोट बन जाती है। ताज़ा मामला तमकुहीराज तहसील का है, जहाँ बार संघ के अधिवक्ताओं ने भ्रष्टाचार के आरोपों की ऐसी पोटली खोली कि दफ्तरों की मेज़ों पर रखी फाइलें भी मानो सकपका गईं।
निरीक्षण पर पहुँचे अपर आयुक्त, गोरखपुर अजय राय के समक्ष बार संघ अध्यक्ष अशोक राय और मंत्री अमरनाथ सिंह ने पत्रक सौंपते हुए तहसील के विभिन्न पटल पर अवैध धन वसूली, मनमानी और चरम स्तर पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप जड़े। आरोपों की धार इतनी तीखी बताई गई कि “प्रक्रिया” और “पारदर्शिता” जैसे शब्द भी कुछ पल के लिए मौन दिखाई दिए।
अधिवक्ताओं का कहना है कि आमजन की समस्याओं के समाधान का केंद्र मानी जाने वाली तहसील में काम की गति से ज्यादा चर्चा “गति शुल्क” की हो रही है। फाइल आगे बढ़ाने से पहले ‘औपचारिकताओं’ का वजन बढ़ जाता है, और न्याय की उम्मीद लिए आए नागरिकों को नियमों की भूलभुलैया में चक्कर काटने पड़ते हैं। सवाल केवल बाबुओं तक सीमित नहीं रहे; एसडीएम, तहसीलदार और नायब तहसीलदार स्तर पर भी कार्यशैली को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए गए।
कटाक्ष भरे लहजे में अधिवक्ताओं ने यह भी कहा कि यदि व्यवस्था का यही ‘मॉडल’ रहा, तो जनता को सेवा से पहले सहनशीलता का प्रशिक्षण देना पड़ेगा। उपनिबंधक कार्यालय को तहसील से दूर स्थापित किए जाने पर नाराजगी जताते हुए उन्होंने तर्क दिया कि इससे आम नागरिक की परेशानी और खर्च दोनों बढ़े हैं—सुविधा के नाम पर असुविधा का विस्तार।
हालाँकि, प्रशासन की ओर से संतुलित प्रतिक्रिया सामने आई। अजय राय ने पूरे प्रकरण की जांच और उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया। आश्वासन वही परिचित शब्द है, जो हर विवाद के अंत में विराम चिन्ह की तरह लगाया जाता है—अब देखना यह है कि यह विराम स्थायी समाधान में बदलता है या अगली बैठक तक टलता है।
जनता की निगाहें अब जांच की दिशा और निष्कर्ष पर टिक गई हैं। क्योंकि अंततः सवाल किसी एक दफ्तर या पद का नहीं, बल्कि उस भरोसे का है, जो नागरिक अपने प्रशासन से जोड़कर रखता है।
