

कागजों में सुरक्षा, जमीन पर खतरा — निर्माण स्थल बना ‘मौत का मैदान’
विलेज फास्ट टाइम्स कुशीनगर से विशेष संवाददाता
कुशीनगर। पडरौना स्थित निर्माणाधीन जिला कारागार परिसर में हुआ एक दर्दनाक हादसा न सिर्फ एक महिला मजदूर की जिंदगी पर भारी पड़ा, बल्कि पूरे निर्माण तंत्र की संवेदनहीनता और लापरवाही की परतें भी उधेड़ गया। सवाल अब एक घटना का नहीं, बल्कि उस सोच का है जहां मजदूर की जान से ज्यादा “काम की रफ्तार” और “निरीक्षण की चमक” को प्राथमिकता दी जाती है।

शनिवार को जब अधिकारी वर्ग एआईजी (कारागार) के संभावित निरीक्षण को लेकर व्यवस्थाओं को चमकाने में जुटा था, उसी समय हकीकत खून से सनी जमीन पर तड़प रही थी। निर्माणाधीन टाइप-2 बिल्डिंग में काम कर रही महिला मजदूर संगीता देवी के सिर पर ऊपरी मंजिल से ईंट का टुकड़ा आ गिरा। जोरदार चोट के साथ वह मौके पर ही लहूलुहान होकर गिर पड़ीं। आनन-फानन में उन्हें निजी अस्पताल पहुंचाया गया, जहां हालत गंभीर होने पर ICU में भर्ती किया गया। सिटी स्कैन में गंभीर सिर की चोट सामने आने के बाद डॉक्टरों ने जिला अस्पताल, और फिर गोरखपुर रेफर कर दिया।
अब सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक हादसा था? या फिर यह “व्यवस्थित लापरवाही” का नतीजा है?
निर्माण स्थल पर सुरक्षा इंतजामों की हकीकत किसी से छिपी नहीं है। कागजों में हेलमेट, सेफ्टी नेट, सुपरविजन और सेफ्टी ऑफिसर की लंबी-चौड़ी सूची जरूर मौजूद होगी, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि मजदूर भगवान भरोसे काम करने को मजबूर हैं। क्या संगीता देवी ने हेलमेट पहना था? अगर नहीं, तो क्यों नहीं? क्या ऊपर काम के दौरान सेफ्टी नेट लगाया गया था? मौके पर जिम्मेदार अधिकारी कहां था? क्या मजदूरों का बीमा कराया गया है?
ये सवाल अब सिर्फ सवाल नहीं, बल्कि सिस्टम के मुंह पर तमाचा हैं।
विशेषज्ञों की मानें तो ऊंचाई पर निर्माण कार्य के दौरान सुरक्षा मानकों का पालन अनिवार्य होता है, लेकिन यहां तो मानो नियमों को खुलेआम दफन कर दिया गया हो। निरीक्षण के नाम पर जल्दबाजी, और उस जल्दबाजी में सुरक्षा को दरकिनार करना — यह लापरवाही नहीं, बल्कि अपराध की श्रेणी में आता है।
हैरानी की बात यह है कि इतनी गंभीर घटना के बाद भी जिम्मेदारों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। न कोई एफआईआर, न कोई जवाबदेही तय। क्या मजदूर की जान इतनी सस्ती है? क्या प्रशासन केवल कागजी खानापूर्ति तक सीमित रह गया है?
यह घटना एक चेतावनी है — अगर अब भी सिस्टम नहीं चेता, तो ऐसे हादसे ‘दुर्घटना’ नहीं, बल्कि ‘प्रायोजित लापरवाही’ कहलाएंगे।
अब देखना यह है कि जिम्मेदारों पर कार्रवाई होती है या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा, और अगला मजदूर फिर किसी “निरीक्षण की तैयारी” का शिकार बनेगा।
